मुरादाबाद। कांठ रोड के समीप संचालित स्कॉलर डेन कोचिंग संस्थान पर मुरादाबाद विकास प्राधिकरण (एमडीए) द्वारा सीलिंग के आदेश जारी होने के बाद संस्थान में हड़कंप मचा हुआ है। अवैध निर्माण और नियमों के उल्लंघन के आरोपों से घिरे इस संस्थान पर किसी भी समय सीलिंग की कार्रवाई हो सकती है। इस बीच संस्थान प्रबंधन ने अब छात्र-छात्राओं के भविष्य को मुद्दा बनाकर पूरे मामले को भावनात्मक मोड़ देने की कोशिश शुरू कर दी है।
गौरतलब है कि स्कॉलर डेन पहले से ही कई गंभीर सवालों के घेरे में रहा है। आरोप हैं कि यहां स्कूलों के नियमित समय में बड़ी संख्या में छात्र-छात्राओं को कोचिंग दी जाती है। यानी जिस समय विद्यार्थियों को अपने-अपने स्कूलों में उपस्थित होना चाहिए, उस समय वे कोचिंग सेंटर में नजर आते हैं। यह स्थिति शिक्षा व्यवस्था और स्कूल प्रशासन की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े करती है।

सीलिंग की खबर के बाद शुरू हुआ ‘विक्टिम कार्ड’?
सीलिंग की कार्रवाई की आशंका के बीच गुरुवार को स्कॉलर डेन के बाहर कुछ छात्र-छात्राओं के साथ प्रदर्शन कराया गया। प्रदर्शन में मौजूद संस्थान के एक शिक्षक और शिक्षिका ने मीडिया से बातचीत करते हुए कहा कि उन्हें जानकारी मिली है कि कोचिंग की बिल्डिंग सील होने जा रही है। उनका तर्क था कि यदि ऐसा हुआ तो नीट सहित अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे छात्र-छात्राओं का भविष्य प्रभावित होगा।

उन्होंने यह भी कहा कि विद्यार्थी पहले से परीक्षा संबंधी अनिश्चितताओं से जूझ रहे हैं और यदि कोचिंग बंद हुई तो वे मानसिक तनाव में आ सकते हैं। संस्थान की ओर से पूरे मामले को छात्रों के हितों से जोड़कर प्रस्तुत करने की कोशिश की गई।
लेकिन असली सवालों से क्यों बच रहा है प्रबंधन?
सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि स्कॉलर डेन प्रबंधन उन मूल आरोपों पर जवाब क्यों नहीं दे रहा जिनकी वजह से वह लगातार विवादों में है। यदि छात्र-छात्राएं स्कूल समय में कोचिंग प्राप्त कर रहे हैं तो वे अपने स्कूलों में अनुपस्थित क्यों नहीं माने जा रहे? उनकी उपस्थिति दर्ज कैसे हो रही है? क्या स्कूलों में फर्जी उपस्थिति लगाई जा रही है? यदि हां, तो इसमें कौन-कौन शामिल है?
यह केवल एक कोचिंग संस्थान का मामला नहीं, बल्कि शिक्षा व्यवस्था में संभावित मिलीभगत और बड़े स्तर पर नियमों की अनदेखी का विषय बनता जा रहा है। जरूरत इस बात की है कि संबंधित स्कूलों की उपस्थिति रजिस्टर, सीसीटीवी रिकॉर्ड और विद्यार्थियों की वास्तविक मौजूदगी की गहन जांच कराई जाए।

धोखाधड़ी के आरोप भी बढ़ा रहे हैं संदेह
संस्थान के संचालक विवेक ठाकुर और उनके स्टाफ से जुड़ी दो सहयोगियों के खिलाफ दस लाख रुपये से अधिक की कथित धोखाधड़ी का मुकदमा थाना सिविल लाइंस में दर्ज होने की जानकारी भी सामने आ चुकी है। ऐसे में संस्थान की कार्यप्रणाली को लेकर पहले से ही कई सवाल उठ रहे हैं। अब अवैध निर्माण और सीलिंग की कार्रवाई ने इन सवालों को और गंभीर बना दिया है।
‘भविष्य’ की चिंता या कार्रवाई से बचने की रणनीति?
विश्लेषकों का मानना है कि यदि किसी संस्थान के खिलाफ प्रशासनिक कार्रवाई उसके भवन, नक्शे या नियमों के उल्लंघन को लेकर हो रही है, तो उसका जवाब कानूनी और तथ्यात्मक आधार पर दिया जाना चाहिए। लेकिन यदि कार्रवाई के मूल कारणों पर चुप्पी साधकर केवल छात्रों के भविष्य को आगे किया जाए, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि कहीं यह सहानुभूति हासिल करने और दबाव बनाने की रणनीति तो नहीं।
सवाल यह भी है कि यदि संस्थान वास्तव में छात्रों के भविष्य को लेकर इतना चिंतित है तो फिर उसने शुरुआत से ही सभी नियमों का पालन क्यों नहीं किया? यदि भवन वैध था, संचालन नियमों के अनुरूप था और छात्र नियमित प्रक्रिया के तहत पढ़ रहे थे, तो आज यह स्थिति पैदा ही क्यों होती?

जांच के दायरे में आनी चाहिए पूरी व्यवस्था
स्कॉलर डेन प्रकरण अब केवल एक बिल्डिंग की सीलिंग तक सीमित नहीं रह गया है। यह मामला स्कूलों में उपस्थिति, कोचिंग संस्थानों की कार्यप्रणाली, प्रशासनिक नियमों के पालन और शिक्षा व्यवस्था की पारदर्शिता से जुड़ गया है। ऐसे में आवश्यकता इस बात की है कि केवल भवन संबंधी अनियमितताओं की ही नहीं, बल्कि स्कूल समय में चल रही कोचिंग, विद्यार्थियों की उपस्थिति और संभावित मिलीभगत के पूरे नेटवर्क की निष्पक्ष जांच कराई जाए।
फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या छात्रों का भविष्य वास्तव में दांव पर है, या फिर छात्रों के भविष्य को ढाल बनाकर अपने ऊपर हो रही कार्रवाई से बचने की कोशिश की जा रही है?
