मुरादाबाद। हाईवे किनारे सरकारी जमीन पर कब्जे के आरोपों में घिरे भाजपा महापौर विनोद अग्रवाल एक बार फिर सवालों के घेरे में हैं। जिस जमीन पर कभी मेयर की बाउंड्री खड़ी थी, वहां अब प्रशासन ने साफ-साफ बोर्ड लगा दिया है—“ये सरकारी भूमि है।”
ज्ञात हो कि करीब दो महीने पहले जिला प्रशासन ने बड़ी कार्रवाई करते हुए हाईवे बाईपास स्थित धीमरी गांव के पास लगभग 10 बीघा जमीन पर बनी बाउंड्री को बुलडोजर से ध्वस्त कर दिया था। जांच में सामने आया कि यह जमीन सरकारी है, जिसे मुख्यमंत्री के ड्रीम प्रोजेक्ट मुख्यमंत्री मॉडल कंपोजिट विद्यालय के लिए आरक्षित किया गया है। अब उसी जमीन पर जिलाधिकारी के निर्देश पर बोर्ड लगाकर इसे शासकीय भूमि घोषित कर दिया गया है।

बोर्ड पर स्पष्ट लिखा है कि गाटा संख्या 1086/3, 1087/1 और 1088, कुल रकबा 1.9870 हेक्टेयर, मुख्यमंत्री मॉडल कंपोजिट विद्यालय के लिए चिन्हित सरकारी भूमि है। साथ ही चेतावनी दी गई है कि किसी भी प्रकार का अतिक्रमण करने पर सख्त कानूनी कार्रवाई होगी।
मेयर के दावे बनाम प्रशासन की जांच
मेयर विनोद अग्रवाल का दावा रहा है कि उन्होंने यह जमीन करीब 10 साल पहले हाजी चांद बाबू से खरीदी थी। इस विवाद को लेकर उन्होंने कमिश्नर से लेकर शासन तक शिकायतें भी कीं। हालांकि, तत्कालीन जिलाधिकारी अनुज सिंह की मौजूदगी में कराई गई पैमाइश में साफ हो गया कि जिस जमीन पर बाउंड्री बनाई गई थी, वह पूरी तरह सरकारी है।

कब्जे के आरोप और राजनीतिक कनेक्शन
प्रशासनिक जांच में यह भी सामने आया कि इस जमीन पर मेयर के साथ उनके पार्टनर संजय रस्तोगी और भाजपा से जुड़े अमित चौधरी का भी नाम सामने आया। आरोप है कि सरकारी जमीन पर बाउंड्री बनाकर कब्जा किया गया, जिसे बाद में प्रशासन ने ध्वस्त कर दिया।
डीएम के ट्रांसफर के बाद फिर हलचल
तत्कालीन डीएम के तबादले के तुरंत बाद इस जमीन पर फिर हलचल देखने को मिली। हाजी चांद बाबू कथित तौर पर गाड़ियों के काफिले के साथ मौके पर पहुंचे और दोबारा नापजोख की कोशिश की, जिससे विवाद और गहरा गया है।

स्कूल प्रोजेक्ट और जमीन का महत्व
यह जमीन नेशनल हाईवे बाईपास के पास स्थित है और मुख्यमंत्री मॉडल कंपोजिट विद्यालय के लिए बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है। करीब 6 एकड़ में बनने वाले इस स्कूल का निर्माण उत्तर प्रदेश प्रोजेक्ट कॉर्पोरेशन लिमिटेड (UPPCL) को सौंपा गया है। मिट्टी परीक्षण सहित प्रारंभिक प्रक्रियाएं भी पूरी हो चुकी हैं।
मेयर पर गंभीर आरोप : अपनी जमीन तक बनवाई सड़क
मामला यहीं खत्म नहीं होता। आरोप है कि मेयर ने अपनी कथित जमीन की कीमत बढ़ाने और पहुंच आसान बनाने के लिए नगर निगम के फंड से जंगल के बीच सड़क बनवा दी। हैरानी की बात यह है कि जिस जगह तक सड़क बनाई गई, वहां न तो कोई आबादी है और न ही कोई चकमार्ग दर्ज है—चारों तरफ सरकारी जमीन ही है।
नगर निगम के दस्तावेज बताते हैं कि 15वें वित्त आयोग की निधि से इस सड़क का निर्माण किया गया, जिसकी मंजूरी खुद मेयर की अध्यक्षता वाली बैठक में दी गई थी। अधिकारियों ने रिपोर्ट में ‘जनहित’ और ‘आवागमन की समस्या’ का हवाला दिया, जबकि जमीनी हकीकत इससे बिल्कुल उलट बताई जा रही है।

म्यूजिकल पार्क बनवाकर अपनी जमीन की कीमत बढ़ाने की थी योजना
नगर निगम के सूत्रों के मुताबिक, जिस स्थान पर मेयर की बाउंड्री वॉल को ध्वस्त किया गया, वहां पहले एक म्यूजिकल पार्क विकसित कराने की योजना पर काम चल रहा था। खुद महापौर विनोद अग्रवाल ने भी इस प्रस्ताव की पुष्टि की है। वहीं, हाल के समय में सत्ताधारी दल से जुड़े कुछ नेताओं पर यह आरोप भी लगातार उठते रहे हैं कि वे विकास परियोजनाओं को अपनी या अपने करीबी लोगों की जमीनों के आसपास केंद्रित कराकर उनकी बाजार कीमत बढ़ाने की कोशिश करते हैं। इसके साथ ही यह भी चर्चा में है कि कई मामलों में योजनाओं के प्रस्तावित क्षेत्रों के आसपास पहले से जमीन खरीदकर बाद में उन्हें सरकारी अधिग्रहण में शामिल कराने का खेल भी बड़े स्तर पर खेला जा रहा है।
जानकारों ने सवाल उठाए हैं कि एक तरफ शहर में बुनियादी सुविधाओं के लिए लोग तरस रहे हैं, वहीं दूसरी ओर सरकारी जमीन पर कब्जा और फिर उसी तक पहुंच बनाने के लिए सरकारी धन के इस्तेमाल के आरोप गंभीर सवाल खड़े करते हैं। फिलहाल प्रशासन ने जमीन पर अपना दावा मजबूत करते हुए बोर्ड लगा दिया है, लेकिन यह मामला राजनीतिक और प्रशासनिक स्तर पर लंबे समय तक चर्चा में रहने वाला है।
