मुरादाबाद/पीपलसाना। मशहूर उर्दू शायर बशीर बद्र की याद में फ़राज़ एकेडमी, पीपलसाना में एक भव्य “बयाद-ए-बशीर बद्र” कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस अवसर पर देश के विभिन्न हिस्सों से आए नामचीन शायरों और साहित्यकारों ने बशीर बद्र की अदबी सेवाओं, शायरी और साहित्यिक योगदान पर अपने विचार व्यक्त करते हुए उन्हें खिराज-ए-अकीदत पेश किया। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में साहित्य प्रेमियों और शायरी के चाहने वालों की मौजूदगी ने महफिल को यादगार बना दिया।

कार्यक्रम की शुरुआत बशीर बद्र के साहित्यिक अवदान पर चर्चा के साथ हुई। वक्ताओं ने कहा कि बशीर बद्र ने अपनी शायरी के माध्यम से मुहब्बत, इंसानियत और सामाजिक सरोकारों को नई पहचान दी। उनकी ग़ज़लें आज भी अदब की दुनिया में बेहद मकबूल हैं और नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा का स्रोत बनी हुई हैं।

महफिल में शायर नफ़ीस पाशा “साहब” मुरादाबादी ने अपना कलाम पेश करते हुए कहा –
“ये जाँ जाती है तो जाए बला से,
न छोड़ेंगे परिंदे आशियाना।”
“तहसीन हज़ारा” के मुसन्निफ़ तहसीन मुरादाबादी ने अपने अंदाज़ में कहा –
“कह दिया यहूदी से खामनई के बेटे ने,
छल-कपट से जंगों के फैसले नहीं होते।”

फरहत अली फरहत पीपलसानवी ने मोहब्बत के जज़्बात को यूँ बयां किया –
“हम चले आए मुहब्बत में तुम्हारी हमदम,
तुम न आए जो कभी तुमको बुलाया हमने।”
ज़ुबैर मुरादाबादी ने कहा –
“मुद्दतों हमने ज़माने को दिया दर्स-ए-हयात,
मुद्दतों तक हमें रोएंगे ज़माने वाले।”
फरीद आलम कादरी ने अपना शेर पढ़ा –
“वो मेरी मंज़िल नहीं जिसमें तुम शामिल नहीं।”
डॉ. आज़म बुराक ने कहा –
“आख़िर कहाँ-कहाँ न रहे ज़िंदगी में हम,
लेकिन जहाँ-जहाँ भी रहे आसमाँ रहे।”

सैफ उर रहमान ने अपने खास अंदाज़ में कहा –
“काम के वक्त कोई काम नहीं करते,
यानी हम काम कोई आम नहीं करते।”
साबिर हुसैन माइल ने वफ़ा और मोहब्बत का जज़्बा पेश करते हुए कहा –
“प्यार का कोई सिला भी नहीं पाया हमने,
रिश्ता-ए-अहले-वफ़ा फिर भी निभाया हमने।”
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि शाह आलम रौनक ने अपना कलाम पेश करते हुए कहा –
“मैंने तो सच को सच ही कहा था मेरे ख़िलाफ़,
फिर यूँ हुआ कि साँप ही रस्सी का बन गया।”
महफिल की अध्यक्षता कर रहे दावर मुरादाबादी ने कहा –
“कितना मुश्किल है मिटाना एक क़तरे का वजूद,
शबनमी क़तरे को सूरज की तमाज़त चाहिए।”
कार्यक्रम का संचालन देश के मशहूर शायर सरफ़राज़ हुसैन फ़राज़ ने किया। उन्होंने अपनी नज़्म और शेरों से महफिल को नई रौनक देते हुए कहा –
“जाम नज़रों से पिलाने का हुआ था वादा,
टालिए मत हमें अंगूर का पानी देकर।”
कार्यक्रम के अंत में बशीर बद्र की साहित्यिक विरासत को आगे बढ़ाने और नई पीढ़ी को उर्दू अदब से जोड़ने का संकल्प लिया गया। देर रात तक चली इस अदबी महफिल में सैकड़ों श्रोताओं ने शायरों के कलाम का आनंद लिया और बशीर बद्र को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की@जफर-INN
