अमरोहा। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के अलीगंज स्थित एक बहुमंजिला इमारत में संचालित अवैध कोचिंग सेंटर , गेमिंग व पेट क्लीनिक में हुए भीषण अग्निकांड ने प्रशासनिक लापरवाही और व्यवस्थागत खामियों को पूरी तरह उजागर कर दिया है। इस हृदयविदारक हादसे में सुरक्षा नियमों की घोर अनदेखी के चलते जहां 15 मासूम विद्यार्थियों को अपनी जान गंवानी पड़ी, वहीं कई बेजुबान जानवर भी संकट में फंस गए। इस घटना की गूंज अब अमरोहा के प्रबुद्ध वर्ग और आम नागरिकों के बीच गहरे रोष और चिंता के रूप में सामने आई है। प्रबुद्ध समाज ने हादसे के लिए जिम्मेदार प्रशासनिक ढांचे को कटघरे में खड़ा करते हुए, शिक्षा व्यवस्था के तेजी से हो रहे व्यवसायीकरण, अनैतिक गतिविधियों और बेलगाम हो चुके कोचिंग उद्योग पर तीखे सवाल उठाए हैं।
समाजशास्त्रियों, पत्रकारों, शिक्षकों और राजनीतिक विचारकों ने इस साझा चिंता के माध्यम से देश की आंतरिक स्थिति, नागरिक समाज की निष्क्रियता और कोचिंग माफिया के कड़वे सच को बेनकाब करते हुए व्यवस्था में आमूलचूल बदलाव की पुरजोर मांग की है।
अमरोहा के प्रमुख बुद्धिजीवियों, जिनमें प्रसिद्ध समाजशास्त्री डॉ. बीएस जिंदल, वरिष्ठ पत्रकार एवं मान्यता प्राप्त पत्रकार समिति के जिलाध्यक्ष महिपाल सिंह,वरिष्ठ पत्रकार डॉ. संतोष गुप्ता, प्रबुद्ध नागरिक जयकरण सैनी, निवर्तमान शिक्षक हाजी अब्दुल सलाम और भाजपा नेता कैलाश गुर्जर शामिल हैं, ने इस पूरे परिदृश्य पर अपनी गहरी चिंता व्यक्त की है। इन चिंतकों का स्पष्ट मानना है कि आज देश में शिक्षा के पावन मंदिरों यानी विद्यालयों में फिल्मों का व्यावसायिक संवर्धन और प्रमोशन किया जाना बेहद चिंताजनक है, जो समाज के मानसिक दिवालियापन को दर्शाता है। वक्ताओं ने इस बात को पुरजोर तरीके से रेखांकित किया कि वर्तमान में तथाकथित फाइव स्टार निजी स्कूलों और सरकारी शिक्षण संस्थानों में गुणवत्तापूर्ण पढ़ाई न होने के कारण ही आज अभिभावक अपने बच्चों को भारी-भरकम फीस चुकाकर कोचिंग सेंटरों में भेजने के लिए विवश हैं। इसके बाद जब छात्र किसी परीक्षा में सफल होते हैं, तो पैसे और ताकत के दम पर देश के अलग-अलग शहरों के कई कोचिंग संस्थानों द्वारा एक ही छात्र को अपना बताकर विज्ञापनों का जो खेल खेला जाता है, वह देश के लोकतांत्रिक और सामाजिक ढांचे में सरेआम लूटपाट का सबसे बड़ा उदाहरण बन चुका है।
इस अव्यवस्था और हादसों के मूल कारणों की पड़ताल करते हुए प्रबुद्ध वर्ग ने आत्ममंथन की जरूरत पर बल दिया है। वक्ताओं का कहना है कि हर मोर्चे पर व्याप्त भ्रष्टाचार, नियम तोड़ने की आम नागरिकों की लत और प्रशासनिक अधिकारियों का लालच मिलकर ऐसी त्रासदियों को जन्म दे रहा है। आज शहरों में धड़ल्ले से हो रहे अवैध निर्माण और सुरक्षा मानकों की अनदेखी के कारण आग, पानी और हवा जैसी बुनियादी चीजें भी इंसानी जिंदगी के लिए सबसे बड़ा खतरा बन चुकी हैं। विडंबना यह है कि समाज के लोग इन गंभीर मुद्दों पर केवल सोशल मीडिया तक ही अपनी जिम्मेदारी सीमित समझ लेते हैं, जबकि धरातल पर कोई ठोस प्रतिरोध दिखाई नहीं देता।
वरिष्ठ चिंतक एवं पत्रकार सुमंत कबीर के आंकड़ों के हवाले से चर्चा में यह चौंकाने वाला तथ्य सामने आया कि देश में इस समय करीब 57 हजार करोड़ रुपये का एक अनैतिक कोचिंग साम्राज्य खड़ा हो चुका है, जो हर साल दस प्रतिशत की सालाना दर से लगातार बढ़ रहा है। इस अनैतिक धंधे के फलने-फूलने की मुख्य वजह यह है कि विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं में अक्सर तय पाठ्यक्रम से बाहर के प्रश्न पूछ लिए जाते हैं, जिसका सीधा और सीधा आर्थिक लाभ इन निजी कोचिंग उद्योगों को मिलता है।
इस गंभीर समस्या के समाधान के लिए अमरोहा के प्रबुद्ध वर्ग ने एकजुट होकर केंद्र सरकार और मानव संसाधन मंत्रालय से यह पुरजोर मांग की है कि भविष्य में होने वाली सभी प्रतियोगी परीक्षाओं में केवल और केवल पूर्व निर्धारित पाठ्यक्रम से ही प्रश्न पूछे जाएं ताकि कोचिंग माफियाओं द्वारा किए जा रहे इस मानसिक और आर्थिक शोषण को तत्काल रोका जा सके।
अंत में नागरिकों ने यह आह्वान किया कि देश के नौनिहालों के भविष्य और जीवन को सुरक्षित करने के लिए अब समाज को अपनी संकीर्ण सियासी निष्ठाओं को छोड़कर व्यापक राष्ट्रीय हित में एकजुट होकर आवाज उठानी होगी और स्वयं के आचरण में भी बदलाव लाना होगा, तभी इस सड़ी-गली व्यवस्था को सुधारा जा सकता है।
