दिल्ली हाईकोर्ट में कॉचरोच जनता पार्टी (CJP) के नेता सौरव दास और आशुतोष रांका की याचिका पर सुनवाई हुई। दोनों की ओर से पेश वकील ने अदालत से याचिका वापस लेने की अनुमति मांगी, जिसे कोर्ट ने स्वीकार कर लिया। हालांकि, अदालत ने स्पष्ट किया कि याचिका वापस लेने के फैसले के दौरान मामले के गुण-दोष पर कोई टिप्पणी नहीं की गई है।
सुनवाई के दौरान दिल्ली पुलिस की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG) ने जमानत बांड के लिए वकीलों को जमानती बनाए जाने पर आपत्ति जताई। अदालत ने बॉन्ड की शर्तों और उनके उल्लंघन पर होने वाली कानूनी कार्रवाई को लेकर भी सवाल उठाए। कोर्ट ने कहा कि BNSS के तहत बॉन्ड तोड़ने पर निर्धारित प्रक्रिया का पालन किया जाना चाहिए, जिसमें जमानत की राशि जब्त करने और संबंधित व्यक्ति को अपना पक्ष रखने का अवसर देने जैसे कदम शामिल हो सकते हैं।
बॉन्ड उल्लंघन और प्रदर्शन के उद्देश्य पर कोर्ट की टिप्पणी
हाईकोर्ट ने सवाल किया कि यदि कोई व्यक्ति दूसरी बार बॉन्ड की शर्तों का उल्लंघन करता है, तो क्या अधिकारियों को उससे अधिक सख्त बॉन्ड भरवाने का अधिकार नहीं है। अदालत ने यह भी कहा कि 11 अक्टूबर को बॉन्ड भरे जाने के बाद शर्तों के उल्लंघन का आरोप सामने आया था। कोर्ट ने अधिकारियों की ओर से दोबारा नोटिस दिए जाने को संभावित नरमी के तौर पर भी देखा।
सुनवाई के दौरान जज ने सौरव दास और आशुतोष रांका की उम्र पूछी। उनके वकील ने बताया कि सौरव दास 27 वर्ष और आशुतोष रांका 31 वर्ष के हैं। इस पर जज ने टिप्पणी की कि वे Gen Z नहीं हैं और मिलेनियल्स तथा Gen Z की आयु सीमा को लेकर भी सवाल किया।
अदालत ने कहा कि लोकतंत्र में शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन करना नागरिकों का अधिकार है। हालांकि, जब किसी मजिस्ट्रेट के सामने शांति भंग होने की आशंका का मामला आता है, तो प्रदर्शनकारियों की पहचान, मंशा और उनकी गतिविधियों जैसे पहलुओं पर विचार करना महत्वपूर्ण हो जाता है। कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि सत्ता में बदलाव लोकतांत्रिक व्यवस्था में चुनाव के माध्यम से होता है।
अब सौरव दास और आशुतोष रांका को मंदिर मार्ग स्थित SEM कोर्ट में पेश किए जाने की बात कही गई है, जहां मामले में आगे की कार्यवाही होगी।
