अमरोहा। संयोग से आज़ अंतरराष्ट्रीय प्रेस स्वतंत्रता दिवस के साथ ही विश्व हास्य दिवस भी है। ख़ासतौर से आज़ के दिन संयुक्त राष्ट्र संघ महासचिव का वाक्य सूत्र है कि “सभी स्वतंत्रताएँ प्रेस की स्वतंत्रता पर निर्भर करती हैं।”
ऐसे मौके पर जहां राजनीतिक गलियारों से शुभकामनाओं और भाषणों की बाढ़ सी आई हुई है, वहीं पत्रकारिता जगत में छाई गहरी उदासीनता व्यवस्था पर बड़े सवाल खड़े कर रही है। हकीकत यह है कि प्रेस की आजादी केवल बयानों तक सीमित रह गई है, जबकि धरातल पर पत्रकार आज भी बुनियादी हकों और कार्यस्थल पर सम्मान और सुरक्षा को लेकर पहले की तरह संघर्षरत है। उल्लेखनीय यह है कि
विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस पर नेताओं की सक्रियता तो देखते ही बनती है, लेकिन पत्रकारों के बीच पसरा सन्नाटा व्यवस्था के प्रति उनके असंतोष को बयां कर रहा है।

पत्रकारों का मानना है कि यदि राजनेता वास्तव में प्रेस की स्वतंत्रता के इतने कायल हैं, तो उन्हें शुभकामनाओं के बजाय एक ऐसी कार्यप्रणाली विकसित करनी चाहिए जहां असहज सवालों के जवाब सहजता से दिए जाएं। जैसे सरकारी दफ्तरों से सूचनाएं सुलभता से प्राप्त हों।अधिकारी और जन प्रतिनिधि पत्रकारों के फोन का जवाब देना अपनी जिम्मेदारी समझें।
लोकतंत्र के कथित प्रहरी माने जाने वाले पत्रकारों के साथ दोहरे मापदंड अपनाए जा रहे हैं। जैसे कोरोना काल के दौरान पत्रकारों को मिलने वाली रेल यात्रा में छूट समाप्त कर दी गई, जो अब तक बहाल नहीं हुई है। इसके विपरीत, सांसदों और विधायकों ने न केवल खुद की रेल यात्रा सुविधाएं बहाल कर लीं, बल्कि संसद और विधानसभाओं में अपने वेतन-भत्ते और करोड़ों रुपये की निधि में भी इजाफा कर लिया।
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा अन्य राज्यों की तर्ज पर पत्रकारों के लिए कई महत्वपूर्ण कल्याणकारी योजनाओं की घोषणा की थीं। जिसमें वरिष्ठ मान्यता प्राप्त पत्रकारों के लिए पेंशन योजना व आर्थिक सुरक्षा का बजट में प्रावधान, पत्रकारों और उनके परिवारों के लिए निशुल्क स्वास्थ्य कवर, जिलेवार पत्रकारों की समस्याओं के निस्तारण हेतु नियमित बैठकें आदि। विडंबना यह है कि मुख्यमंत्री के दूसरे कार्यकाल को पूरे होने में अब महज अब सात-आठ महीने शेष हैं, लेकिन इन घोषणाओं का लाभ अभी भी पत्रकारों की पहुंच से दूर है। देश व राज्यों की राजधानियों को छोड़ दें तो प्रदेश में जमीनी स्तर पर कार्यरत पत्रकारों की स्थिति और भी दयनीय है, जिन पर समाचारों के बजाय राजस्व (विज्ञापन) जुटाने का दबाव रहता है।

अमरोहा के पत्रकारों का स्पष्ट कहना है कि उन्हें सरकार से पेंशन, बीमा या आवास का ‘उपकार’ नहीं चाहिए। उनकी मांग सिर्फ इतनी है कि संविधान द्वारा प्रदत्त अभिव्यक्ति की आजादी को सुनिश्चित किया जाए और उनके काम के मार्ग में आने वाली बाधाओं को दूर किया जाए। यदि सिफारिशें, घोषणाएं धरातल पर लागू हों, तभी सही मायने में प्रेस स्वतंत्रता दिवस सार्थक होगा। सिर्फ शुभकामनाओं से पेट नहीं भरता और न ही लोकतंत्र बचता है। पत्रकारिता को जीवित रखना है तो नारों से बाहर निकलकर व्यवस्था में सुधार की इच्छाशक्ति दिखानी होगी।
“प्रेस की स्वतंत्रता पर लगे अघोषित पहरों का समाधान किसी एक व्यक्ति या संस्था के पास नहीं है, बल्कि यह एक सामूहिक जिम्मेदारी है। यदि हम चाहते हैं कि कलम फिर से निर्भीक हो और ‘सूचना’ व्यापार न बने, तो हमें इन चार प्रमुख स्तरों पर बदलाव की आवश्यकता है : वैकल्पिक मीडिया का सशक्तिकरण, संस्थागत सुरक्षा और स्वायत्तता, न्यूज़ लिट्रेसी, आर्थिक स्वतंत्रता आदि।
छोटे मंच अक्सर उन ज़मीनी सच्चाइयों को सामने लाते हैं जिन्हें कथित मुख्यधारा का मीडिया नज़रंदाज़ कर देता है।”
