लखनऊ। उत्तर प्रदेश में पत्रकारों के हितों और उनकी सामाजिक सुरक्षा से जुड़ी योजनाओं की स्थिति एक बार फिर सवालों के घेरे में है। वर्ष 2021 और 2022 में जारी शासनादेशों के बावजूद पत्रकार पेंशन और चिकित्सा सुविधाएं अब तक धरातल पर लागू नहीं हो सकी हैं। साढ़े तीन साल बीत जाने के बाद भी ये योजनाएं महज़ कागज़ों तक सीमित हैं।

इस पूरे मामले में वरिष्ठ पत्रकार अजीत कुमार सिंह द्वारा मुख्यमंत्री को भेजे गए अनुस्मारक पत्र ने प्रशासनिक ढिलाई को उजागर कर दिया है। पत्र में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया है कि 7 दिसंबर 2021 को जारी शासनादेश के तहत प्रदेश के लगभग 5000 मान्यता प्राप्त पत्रकारों और उनके आश्रित परिवारों को मुख्यमंत्री जन आरोग्य योजना के अंतर्गत चिकित्सा सुविधा देने का प्रावधान किया गया था। इसके लिए प्रति परिवार वार्षिक व्यय भी निर्धारित किया गया था।

साथ ही, 2 जून 2022 समेत अन्य पत्रों के माध्यम से 60 वर्ष से अधिक आयु के मान्यता प्राप्त पत्रकारों को पेंशन देने का भी प्रावधान किया गया था। बावजूद इसके, शासन द्वारा कई बार अनुस्मारक जारी करने के बाद भी सूचना विभाग की ओर से पात्र पत्रकारों का पूरा डेटा उपलब्ध नहीं कराया गया।

पत्र में यह भी रेखांकित किया गया है कि वर्ष 2023, 2024 और 2025 में लगातार अनुस्मारक दिए जाने के बावजूद स्थिति जस की तस बनी हुई है। नतीजतन, न तो पत्रकारों को चिकित्सा सुविधा का लाभ मिल पा रहा है और न ही पेंशन योजना का क्रियान्वयन हो सका है।
अजीत कुमार सिंह ने अपने पत्र में मुख्यमंत्री से अनुरोध किया है कि इतने लंबे समय से लंबित इन योजनाओं के क्रियान्वयन में आ रही बाधाओं की उच्चस्तरीय जांच कराई जाए और जल्द से जल्द पात्र पत्रकारों को उनका अधिकार दिलाया जाए।
गौरतलब है कि जहां बड़े पत्रकार संगठन इस मुद्दे पर चुप्पी साधे हुए हैं, वहीं एक व्यक्ति का यह प्रयास न केवल व्यवस्था की निष्क्रियता को उजागर करता है, बल्कि सरकार की जवाबदेही भी तय करने की मांग करता है। अब देखना यह होगा कि सरकार इस गंभीर मामले में कितनी तत्परता दिखाती है और पत्रकारों को उनका हक कब तक दिला पाती है।
