अमरोहा। हिंदी पट्टी के प्रिंट मीडिया जगत से एक ऐसी कड़वी और झकझोर देने वाली सच्चाई सामने आई है, जिसने पत्रकारिता के आदर्शों और इसकी आंतरिक संवेदनहीनता को कटघरे में खड़ा कर दिया है। मेरठ में वरिष्ठ पत्रकार राजेश अवस्थी की अवसाद के कारण हुई दुखद आत्महत्या ने इस संकट को पूरी तरह उजागर किया है। यह घटना केवल एक व्यक्ति की मौत नहीं है, बल्कि इस पेशे में दिन-रात ईमानदारी से खटने वाले पत्रकारों के आर्थिक संकट, मानसिक अलगाव और व्यवस्था की निष्ठुरता का जीता-जागता दस्तावेज़ है।

वर्तमान में ज़मीनी स्तर पर काम करने वाले अधिकांश पत्रकार घोर हताशा के दौर से गुजर रहे हैं, जहाँ न तो आर्थिक सुरक्षा बची है और न ही वह सामाजिक प्रतिष्ठा, जिसके वे हकदार हैं।
इस पूरे प्रकरण में हिंदी पट्टी के दो सबसे बड़े समाचार पत्रों की संपादकीय प्रबंधन नीतियों पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। आरोप है कि ये संस्थान अपने ही उन सहयोगियों को, जिन्होंने वर्षों तक संस्थान को सींचा, अंतिम समय में वह सम्मान नहीं देते जिसके वे पात्र थे।
राजेश अवस्थी जैसे कर्मठ पत्रकारों की मृत्यु की खबरों को बेहद सामान्यीकरण (जनरलाइजेशन) के साथ पेश किया जाता है। उन्हें समाचारों में ‘फलां गली-मोहल्ले का निवासी’, ‘असहाय बूढ़ा’ या ‘अवसादग्रस्त व्यक्ति’ लिखकर औपचारिकता निभाते हुए निबटा दिया जाता है, ताकि संस्थान की खुद की जिम्मेदारी और बाजारवाद की कलई न खुले।
इसके विपरीत, इन्हीं अखबारों के प्रबंधन से जुड़े सगे-संबंधियों या रसूखदारों के निधन या सामान्य आयोजनों पर विशेष अलंकृत शब्दों और महिमामंडन का सहारा लिया जाता है। खबरों का यह दोहरा पैमाना प्रिंट मीडिया के आंतरिक खोखलेपन को पूरी तरह उजागर करता है।
वास्तविकता यह है कि मुख्यधारा की पत्रकारिता में जो व्यक्ति ‘तिगड़मबाजी और दलाली’ के घालमेल से दूर रहता है, उसके लिए जीवनयापन का संकट खड़ा हो जाता है। विशेषकर 45 से 50 वर्ष की आयु पार कर चुके पत्रकारों के लिए स्थितियां और भयावह हो जाती हैं, क्योंकि इस उम्र में नया काम शुरू करना जोखिम भरा होता है और परिवार की जिम्मेदारियां चरम पर होती हैं।
पत्रकारिता एक ऐसा रोग बन चुका है कि इसके अलावा कोई दूसरा हुनर न सीख पाने के कारण मुख्यधारा से हटने के बाद वापसी के सारे रास्ते बंद हो जाते हैं। राजेश अवस्थी के सुसाइड नोट में छिपी परिवार के प्रति कुछ न कर पाने की आत्म-ग्लानि इसी ढहते सिस्टम का परिणाम है। बाजारवाद के इस दौर में संस्थान अब केवल काम निकालने तक सीमित रह गए हैं।
यह घटना प्रिंट मीडिया के सामने एक ऐसा अनुत्तरित प्रश्न छोड़ गई है कि क्या समाज और तंत्र की आवाज़ बनने वाले ईमानदार पत्रकारों का अंत इसी तरह गुमनामी, उपेक्षा और अभावों में होना तय माना जा चुका है?
