मुरादाबाद। कांठ रोड स्थित नई तहसील भवन के समीप संचालित स्कॉलर डेन कोचिंग संस्थान एक बार फिर चर्चा और विवादों के केंद्र में आ गया है। शहर के प्रमुख मार्ग पर संचालित इस संस्थान को लेकर स्थानीय लोगों, अभिभावकों और जागरूक नागरिकों के बीच कई गंभीर प्रश्न उठ रहे हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब स्कूलों का समय चल रहा होता है, तब बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएं आखिर कोचिंग संस्थान में कैसे मौजूद रहते हैं और क्या संबंधित विभागों ने कभी इसकी जांच करने की आवश्यकता महसूस की है?
स्थानीय लोगों का आरोप है कि संस्थान में प्रतिदिन बड़ी संख्या में विद्यार्थियों को बसों के माध्यम से लाया जाता है। सुबह से लेकर दोपहर तक कई बसें संस्थान के आसपास खड़ी दिखाई देती हैं, जिससे कांठ रोड और नई तहसील के आसपास का इलाका कई बार यातायात दबाव का सामना करता है। व्यस्त मार्ग होने के कारण यहां वाहनों की लंबी कतारें लगना आम बात बन गई है।
स्कूल में पढ़ाई या कोचिंग में मौजूदगी, आखिर क्या है व्यवस्था?
शिक्षा जगत से जुड़े लोगों का कहना है कि यदि स्कूलों में नियमित शिक्षण कार्य चल रहा है तो विद्यार्थियों की इतनी बड़ी संख्या दिन के समय कोचिंग संस्थान में कैसे पहुंच रही है। यह प्रश्न इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि शिक्षा विभाग लगातार विद्यालयों में उपस्थिति और नियमित पढ़ाई पर जोर देता है।
यदि विद्यार्थी स्कूल समय में कोचिंग कर रहे हैं तो यह जांच का विषय है कि कहीं शिक्षा व्यवस्था के मूल उद्देश्य को ही तो प्रभावित नहीं किया जा रहा। वहीं यदि विद्यार्थियों को विशेष अनुमति या किसी वैकल्पिक व्यवस्था के तहत बुलाया जाता है तो उसकी पारदर्शिता भी सार्वजनिक होनी चाहिए।
बसों का जमावड़ा और ट्रैफिक व्यवस्था पर असर
स्थानीय नागरिकों का आरोप है कि संस्थान के बाहर बड़ी संख्या में बसों और वाहनों के खड़े होने से यातायात प्रभावित होता है। नई तहसील, सरकारी कार्यालयों और आसपास के आवासीय क्षेत्रों में आने-जाने वाले लोगों को कई बार परेशानी का सामना करना पड़ता है।
लोगों का कहना है कि यदि किसी व्यावसायिक या शैक्षणिक संस्थान के कारण सार्वजनिक मार्ग पर दबाव बढ़ रहा है तो ट्रैफिक पुलिस और प्रशासन को इसकी समीक्षा करनी चाहिए। सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या संस्थान के पास पर्याप्त पार्किंग और यातायात प्रबंधन की व्यवस्था है या नहीं।
जुलूस, आतिशबाजी और सार्वजनिक व्यवस्था पर भी उठे सवाल
संस्थान पर यह आरोप भी लगाए जाते रहे हैं कि विभिन्न अवसरों पर बड़ी संख्या में छात्रों की भीड़ के साथ जुलूसनुमा कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि ऐसे आयोजनों के दौरान सड़क पर भीड़ बढ़ जाती है और कई बार आतिशबाजी भी की जाती है।
हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है, लेकिन यदि ऐसा हुआ है तो यह भी जांच का विषय है कि क्या संबंधित कार्यक्रमों के लिए आवश्यक प्रशासनिक अनुमति ली गई थी और सुरक्षा मानकों का पालन किया गया था।
बड़े-बड़े दावे, चमकदार विज्ञापन और अभिभावकों की उम्मीदें
स्कॉलर डेन द्वारा समय-समय पर समाचार पत्रों और अन्य माध्यमों में बड़े पैमाने पर विज्ञापन प्रकाशित किए जाते रहे हैं। इन विज्ञापनों में प्रतियोगी परीक्षाओं और विभिन्न शैक्षणिक उपलब्धियों को प्रमुखता से प्रस्तुत किया जाता है। स्वाभाविक रूप से ऐसे प्रचार से प्रभावित होकर बड़ी संख्या में अभिभावक अपने बच्चों का प्रवेश कराते हैं और मोटी फीस भी जमा करते हैं।
शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी संस्थान द्वारा किए जाने वाले दावों की सत्यता और पारदर्शिता अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। यदि सफलता का श्रेय किसी छात्र को लेकर एक से अधिक संस्थानों द्वारा दावा किया जाता है तो इसकी स्वतंत्र जांच होनी चाहिए ताकि अभिभावकों को सही जानकारी मिल सके।
पुराने विवाद भी बने हुए हैं चर्चा का विषय
स्थानीय स्तर पर यह मामला भी चर्चा में रहा है कि पूर्व में एक छात्र की सफलता को लेकर विभिन्न संस्थानों द्वारा अपने-अपने दावे किए गए थे। इस संबंध में शिकायतें भी की गई थीं और मामले को प्रशासनिक स्तर तक उठाया गया था।
जानकारों का कहना है कि यदि किसी शिकायत पर जांच लंबित है या उसका अंतिम निष्कर्ष सामने नहीं आया है तो संबंधित विभागों को पारदर्शी तरीके से स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए, जिससे भ्रम की स्थिति समाप्त हो सके।
शिक्षा विभाग और प्रशासन से उठ रहे तीखे सवाल
सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि यदि स्कूल समय में बड़े पैमाने पर कोचिंग गतिविधियां संचालित हो रही हैं तो क्या कभी शिक्षा विभाग ने मौके पर पहुंचकर निरीक्षण किया? क्या छात्र उपस्थिति, परिवहन व्यवस्था और संस्थान के संचालन संबंधी मानकों की जांच की गई? यदि नहीं, तो क्यों?
इसी प्रकार ट्रैफिक पुलिस, नगर प्रशासन और अन्य संबंधित विभागों की भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि आम नागरिक द्वारा किसी नियम का उल्लंघन किया जाए तो तत्काल कार्रवाई होती है, लेकिन प्रभावशाली संस्थानों के मामलों में अक्सर विभागीय चुप्पी दिखाई देती है।
जांच की मांग तेज
नागरिकों और अभिभावकों का एक वर्ग अब मांग कर रहा है कि जिला प्रशासन, शिक्षा विभाग और ट्रैफिक पुलिस संयुक्त रूप से स्कॉलर डेन संस्थान की गतिविधियों की जांच करें। यह स्पष्ट किया जाए कि स्कूल समय में विद्यार्थियों की मौजूदगी किन नियमों के तहत है, यातायात प्रबंधन की क्या व्यवस्था है और संस्थान द्वारा किए जाने वाले प्रचार-प्रसार के दावे कितने तथ्यात्मक हैं।
मुख्य सवाल
स्कूल समय में बड़ी संख्या में छात्र कोचिंग संस्थान में कैसे पहुंच रहे हैं?
क्या शिक्षा विभाग ने कभी संस्थान का औचक निरीक्षण किया?
बसों के कारण लगने वाले जाम की जिम्मेदारी कौन तय करेगा?
क्या संस्थान के पास पर्याप्त पार्किंग और ट्रैफिक प्रबंधन व्यवस्था है?
विज्ञापनों में किए जाने वाले दावों की सत्यता की जांच कौन करेगा?
पूर्व में हुई शिकायतों का अंतिम निस्तारण आज तक सार्वजनिक क्यों नहीं हुआ?
फिलहाल इन सभी सवालों के जवाब प्रशासनिक जांच और आधिकारिक तथ्यों के बाद ही सामने आ सकेंगे, लेकिन इतना तय है कि शहर के बीचों-बीच संचालित इस संस्थान को लेकर उठ रहे प्रश्न अब सार्वजनिक बहस का विषय बन चुके हैं।
