अमरोहा। देश की राजधानी का ऐतिहासिक धरनास्थल जंतर-मंतर इस समय एक बड़े राजनीतिक, सामाजिक और वैचारिक टकराव का मुख्य केंद्र बन चुका है। उत्तर प्रदेश के अमरोहा से लेकर दिल्ली के गलियारों तक छात्र राजनीति की तपिश साफ महसूस की जा रही है, जहां अलग-अलग विचारधाराओं से जुड़े छात्र नेता इस आंदोलन को लेकर अपने-अपने तर्कों के साथ आमने-सामने आ गए हैं। भर्ती परीक्षाओं में गड़बड़ियों, पेपर लीक और बढ़ती बेरोजगारी के खिलाफ शुरू हुआ यह प्रदर्शन अब सिर्फ एक सामान्य धरना न रहकर बहुस्तरीय संगठित आंदोलन का रूप ले चुका है, जिसमें एक तरफ व्यवस्था में गहरे बदलाव की मांग है, तो दूसरी तरफ इसके पीछे छिपी कथित राजनीतिक प्लानिंग को लेकर तीखे हमले किए जा रहे हैं।
इस पूरे घटनाक्रम पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए भाजपा समर्थित छात्र नेता भूपेंद्र गुर्जर ने आंदोलन की मंशा पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने सोशल मीडिया पर वायरल दावों का हवाला देते हुए कहा कि आंदोलन के प्रमुख चेहरों के संबंध वामपंथी नेताओं से हैं, जो किसी अन्य एजेंडे पर काम कर रहे हैं। उन्होंने जंतर-मंतर पर जुटे कुछ प्रदर्शनकारियों की तुलना कॉकरोच से करते हुए एक वैज्ञानिक तर्क के जरिए तंज कसा कि सिर कट जाने के बाद भी कई दिनों तक जीवित रहने और बिना भोजन के विपरीत परिस्थितियों में टिके रहने की खूबी रखने वाले इस जीव की तरह यहां भी एक खास किस्म की प्लानिंग को अंजाम देने की कोशिश की जा रही है। उन्होंने डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर चल रहे नैरेटिव वॉर का जिक्र करते हुए कहा कि एयरपोर्ट पर उतरते ही वामपंथी नेताओं को फोन किए जाने जैसे दावे इस आंदोलन के राजनीतिक कनेक्शन को उजागर करते हैं।

इसके विपरीत, बेरोजगार संघ से जुड़े छात्र नेता मनीष सिंह ने इस आंदोलन को युवाओं के अस्तित्व और अधिकारों की लड़ाई करार दिया है। मनीष सिंह का कहना है कि आज वैश्विक स्तर पर बांग्लादेश, केन्या और अरब स्प्रिंग की तर्ज पर दुनिया के 150 से अधिक देशों में जो प्रदर्शन हो रहे हैं, उनका मुख्य केंद्र युवा ही हैं जो सत्ता परिवर्तन, महंगाई, असमानता और लोकतांत्रिक संस्थाओं की विफलता के खिलाफ सड़कों पर हैं। उन्होंने ‘कॉकरोच डरते भी नहीं, कभी मरते भी नहीं’ के नारे के साथ प्रदर्शनकारियों की एकजुटता को रेखांकित करते हुए कहा कि 2.4 अरब युवाओं वाली इस दुनिया में बेरोजगारी और जीवन-यापन की बढ़ती लागत ने युवाओं के गुस्से को एक संरचनात्मक रूप दे दिया है।
उन्होंने मीडिया के एक वर्ग पर भी सवाल उठाया और कहा कि बिना वर्गीकरण के सभी के साथ एक जैसा बर्ताव करने के बजाय सच्चे पत्रकारों को समाज और व्यवस्था का आईना बनना चाहिए, क्योंकि देश का युवा अब अपनी आर्थिक सुरक्षा और भर्ती प्रक्रियाओं में सुधार के लिए डरने के बजाय लड़ने को तैयार है।
वर्तमान में जंतर-मंतर पर लेफ्ट फ्रंट की घटक पार्टियों, सीपीआई (एम एल) नेता दीपांकर भट्टाचार्य, जेएनयू के छात्र संगठनों और एसएफआई के कार्यकर्ताओं की मौजूदगी ने माहौल को अत्यधिक ऊर्जावान और वैचारिक रूप से मुखर बना दिया है। ढपली, नारों और प्रदर्शनकारी संस्कृति के बीच भीषण गर्मी में भी भीड़ का उत्साह बना हुआ है, जिसे कुछ लोग ऐतिहासिक जनउभार तो कुछ केवल सोशल मीडिया-ड्रिवन इवेंट मान रहे हैं। डिजिटल मीडिया और यूट्यूब चैनलों में साफ तौर पर बंटे इस विभाजन के बीच थंबनेल, हेडलाइंस और वीडियो क्लिप्स के जरिए समानांतर रूप से एक नैरेटिव वॉर लड़ा जा रहा है, जो यह साबित करता है कि भारत में अब आंदोलनों की प्रकृति सड़कों से आगे बढ़कर डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर भी उतनी ही जटिल और आक्रामक हो चुकी है।
