मुरादाबाद। मुख्यमंत्री के सख्त रुख के बाद भले ही अब मुरादाबाद विकास प्राधिकरण अवैध निर्माणों, मानचित्र के विपरीत निर्माण और आवासीय भवनों के व्यावसायिक उपयोग के खिलाफ अभियान चलाने की बात कर रहा हो, लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि वर्षों तक इन अवैध गतिविधियों को संरक्षण देने वाले अधिकारियों और कर्मचारियों की जवाबदेही आखिर कब तय होगी?
शहर में जिस तरह आवासीय कॉलोनियों के बीच बड़े-बड़े शोरूम, डिपार्टमेंटल स्टोर, अस्पताल, कोचिंग सेंटर और बेसमेंट खड़े हुए हैं, उसे देखकर यह कहना गलत नहीं होगा कि मुरादाबाद को सुनियोजित तरीके से खतरे के मुहाने पर पहुंचाया गया है। जानकारों का मानना है कि यह सब बिना विभागीय मिलीभगत और संरक्षण के संभव ही नहीं था।
शिकायत करो तो नोटिस का बहाना, निर्माण जारी रखने की खुली छूट
स्थानीय नागरिकों का आरोप है कि जब भी किसी अवैध निर्माण या आवासीय भवन के व्यावसायिक उपयोग की शिकायत की जाती थी, तो प्राधिकरण की ओर से “धारा 27 का नोटिस जारी कर दिया गया है” कहकर मामला ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता था। महीनों और वर्षों तक फाइलें चलती रहीं, लेकिन दूसरी ओर निर्माण कार्य पूरी रफ्तार से जारी रहा।
शिकायतकर्ताओं का यह भी आरोप है कि कई मामलों में उन्हें ही मानसिक रूप से प्रताड़ित किया गया, जबकि नियम तोड़ने वालों के खिलाफ प्रभावी कार्रवाई नहीं की गई।
रामगंगा विहार, मधुबनी, आशियाना का बदला चरित्र
रामगंगा विहार, मधुबनी और आशियाना जैसी पॉश आवासीय कॉलोनियों में नागरिकों के विरोध के बावजूद मकानों को तोड़कर विशाल शोरूम और व्यावसायिक प्रतिष्ठान खड़े कर दिए गए। जिन भवनों के नक्शे केवल आवासीय उपयोग के लिए स्वीकृत हुए थे, उनमें बड़े-बड़े कोचिंग सेंटर, अस्पताल और व्यावसायिक प्रतिष्ठान संचालित किए जाने लगे।
कई स्थानों पर नियमों की अनदेखी कर बेसमेंट भी बनाए गए, जो आपातकालीन स्थिति में बड़े हादसों का कारण बन सकते हैं।
क्या किसी बड़े हादसे का इंतजार था?
हाल के वर्षों में देशभर में बेसमेंट, कोचिंग संस्थानों और व्यावसायिक भवनों में हुए अग्निकांडों ने सुरक्षा व्यवस्था की पोल खोल दी है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि यदि शहर में नियमों के विपरीत निर्माण और उपयोग वर्षों से हो रहा था, तो जिम्मेदार अधिकारियों ने समय रहते कार्रवाई क्यों नहीं की?
क्या प्रशासन किसी बड़े हादसे के बाद ही जागता है? क्या नागरिकों की जान की कीमत केवल कागजी नोटिसों तक सीमित है?
शहर के हर कोने में अवैध निर्माण, जिम्मेदार कौन?
शहर के विभिन्न क्षेत्रों में खुलेआम हो रहे अवैध निर्माणों को देखकर नागरिक पूछ रहे हैं कि जब निर्माण कार्य महीनों तक चलता रहा, तब विकास प्राधिकरण के अभियंता, निरीक्षक और अन्य जिम्मेदार अधिकारी क्या कर रहे थे? यदि उन्हें जानकारी नहीं थी तो यह घोर लापरवाही है, और यदि जानकारी थी तो मामला और भी गंभीर है।
अब कार्रवाई केवल भवनों पर नहीं, अफसरों पर भी हो
मुख्यमंत्री के निर्देशों के बाद यदि अवैध निर्माणों के खिलाफ अभियान चलाया जा रहा है तो यह स्वागतयोग्य कदम है, लेकिन केवल भवन सील कर देने या बुलडोजर चलाने से समस्या का स्थायी समाधान नहीं होगा।
सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि जिन अधिकारियों और कर्मचारियों के कार्यकाल में ये अवैध निर्माण खड़े हुए, आवासीय क्षेत्रों का व्यावसायीकरण हुआ और सुरक्षा मानकों की खुलेआम अनदेखी हुई, उनके खिलाफ विभागीय और कानूनी कार्रवाई कब होगी?
जनता पूछ रही है…
“यदि अवैध निर्माण अपराध है, तो उसे बनने देने वाला तंत्र निर्दोष कैसे हो सकता है?” @शांतनु/INN
