अमरोहा। उत्तर प्रदेश की सियासत में जब भी त्याग, उच्च आदर्शों और किसान-मजदूरों के अधिकारों की बात होगी, ‘गुर्जर गांधी’ चौधरी रामचंद्र विकल का नाम अग्रिम पंक्ति में लिया जाएगा। आज 26 जून को उनकी पुण्यतिथि के अवसर पर पूरा देश इस महान जननायक को नमन कर रहा है, लेकिन इस वर्ष यह अवसर विकल परिवार और उनके समर्थकों के लिए अत्यंत भावुक और पीड़ादायक बन गया है। पिता की पुण्यतिथि से ठीक एक दिन पहले, 24 जून को उनके सुपुत्र व पूर्व विधायक (एमएलसी) चौधरी जगवीर सिंह विकल का लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया, जिनका अंतिम संस्कार 25 जून को उनके पैतृक स्थान पर किया गया। पिता और पुत्र दोनों का इस तरह एक दिन के अंतराल पर स्मरण समूचे पश्चिमी उत्तर प्रदेश को गहरे शोक में डुबो गया है।
राजनीतिक इतिहास के पन्नों को पलटें तो रामचंद्र विकल का व्यक्तित्व सामान्य राजनेताओं से कोसों दूर था। वर्ष 1952 से लगातार पांच बार दादरी और सिकंदराबाद से विधायक चुने जाने वाले विकल जी बाद में बागपत से लोकसभा सांसद और राज्यसभा सदस्य भी रहे। उनके राजनीतिक जीवन का सबसे स्वर्णिम और ऐतिहासिक अध्याय 1967 में लिखा गया, जब उत्तर प्रदेश में पहली बार गैर-कांग्रेसी सरकार (संयुक्त विधायक दल) के गठन का समय आया। राजनैतिक विश्लेषकों के अनुसार, संयुक्त विधायक दल का नेता चुने जाने के बाद रामचंद्र विकल का मुख्यमंत्री बनना पूरी तरह तय हो चुका था, लेकिन उन्होंने सत्ता के मोह से ऊपर उठकर सिद्धांतों और गठबंधन की मजबूती को प्राथमिकता दी।
उन्होंने बेहद उदारता दिखाते हुए मुख्यमंत्री की कुर्सी चौधरी चरण सिंह को सौंप दी और स्वयं उपमुख्यमंत्री व कृषि मंत्री के रूप में जनता की सेवा करना स्वीकार किया। आर्य समाज की विचारधारा से प्रेरित और एक सच्चे स्वतंत्रता सेनानी रहे विकल जी ने सिंचाई दरों में राहत, भूमि राजस्व में छूट और ग्रामीण शिक्षा के विस्तार में जो योगदान दिया, उसी के चलते उन्हें जनता ने सम्मानपूर्वक ‘गुर्जर गांधी’ की उपाधि दी।
आज इस विशेष दिन पर कृतज्ञ राष्ट्र और क्षेत्र की जनता चौधरी रामचंद्र विकल और उनके सुपुत्र चौधरी जगवीर सिंह विकल की सादगीपूर्ण एवं जनहित को समर्पित विरासत को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित कर रही है।
