इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव टालने के मामले में राज्य सरकार पर कड़ी टिप्पणी की है। न्यायमूर्ति सिद्धार्थ नंदन की एकल पीठ ने अरविंद राठौर की याचिका पर सुनवाई करते हुए 25 और 26 मई 2026 को जारी उन सरकारी आदेशों को प्रभावहीन करार दिया, जिनके आधार पर पंचायत चुनाव स्थगित किए गए थे। अदालत ने कहा कि ये आदेश उत्तर प्रदेश पंचायत राज अधिनियम, 1947 की धारा 12(3-ए) के तहत जारी किए गए थे, जबकि इस प्रावधान को पहले ही हाईकोर्ट की खंडपीठ ‘प्रमोद लाल पटेल बनाम उत्तर प्रदेश राज्य’ मामले में असंवैधानिक घोषित कर चुकी है।
अदालत ने स्पष्ट किया कि संविधान के अनुच्छेद 243-ई और 243-के के अनुसार पंचायतों का कार्यकाल पांच वर्ष का निश्चित होता है और समय पर चुनाव कराना संवैधानिक जिम्मेदारी है। राज्य सरकार ने चुनाव में देरी की वजह ओबीसी आयोग की लंबित रिपोर्ट बताई, जिस पर कोर्ट ने नाराजगी जताते हुए कहा कि सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के बावजूद आयोग अब तक अपनी रिपोर्ट क्यों नहीं दे पाया, यह गंभीर सवाल है।
सुनवाई के दौरान राज्य चुनाव आयोग ने अदालत को बताया कि 10 जून 2026 को मतदाता सूची प्रकाशित की जा चुकी है और आयोग चुनाव कराने के लिए पूरी तरह तैयार है। हालांकि, राज्य सरकार की ओर से आवश्यक संसाधन और प्रशासनिक सहयोग उपलब्ध न होने के कारण चुनाव प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ पा रही है।
हाईकोर्ट ने मौजूदा प्रधानों को प्रशासक के रूप में कार्य जारी रखने की अनुमति देने से भी इनकार कर दिया। साथ ही राज्य सरकार को अंतिम अवसर देते हुए विस्तृत हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया, जिसमें ओबीसी आयोग की रिपोर्ट की स्थिति और चुनाव कराने की स्पष्ट समय-सीमा बतानी होगी। अदालत ने चेतावनी दी कि यदि सरकार ऐसा करने में विफल रहती है तो 25 मई 2026 का आदेश जारी करने वाले संबंधित अधिकारी को अगली सुनवाई पर व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होकर जवाब देना होगा कि असंवैधानिक प्रावधान के तहत आदेश क्यों जारी किया गया। ऐसा न होने पर इसे प्रथम दृष्टया अवमानना का मामला माना जा सकता है। मामले की अगली सुनवाई 13 जुलाई 2026 को दोपहर दो बजे होगी।
