इलाहाबाद हाईकोर्ट ने निकाह, हलाला और तीन तलाक से जुड़े एक मामले में सख्त रुख अपनाते हुए कहा है कि व्यक्तिगत कानूनों की आड़ में किसी महिला के साथ यौन शोषण या किसी भी तरह के अपराध को स्वीकार नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामले संविधान के मूल सिद्धांतों और महिलाओं की गरिमा के खिलाफ हैं।
हाईकोर्ट की जस्टिस जे.जे. मुनीर और जस्टिस तरुण सक्सेना की बेंच ने अमरोहा के सैदनागली थाना क्षेत्र से जुड़े मामले में पीड़िता के पूर्व पति, उसके चाचा, एक मौलाना और अन्य आरोपियों की याचिकाएं खारिज कर दीं। आरोपियों ने एफआईआर रद्द करने और गिरफ्तारी पर रोक लगाने की मांग की थी, लेकिन अदालत ने राहत देने से इनकार कर दिया।
एफआईआर के मुताबिक, वर्ष 2015 में जब पीड़िता 15 साल की थी, तब उसका निकाह मुख्य आरोपी अजहर नवाज से कराया गया। कुछ महीनों बाद उसे तीन तलाक दे दिया गया। इसके बाद दोबारा शादी के लिए कथित निकाह हलाला कराया गया। पीड़िता का आरोप है कि उस दौरान उसके साथ दुष्कर्म हुआ, जबकि उसे हलाला का मतलब तक नहीं पता था।
आरोप है कि 2017 में दोबारा निकाह होने के बाद भी कुछ सालों में आरोपी ने फिर तलाक दे दिया और दूसरी शादी कर ली। बाद में दूसरी पत्नी के संतान न होने पर पीड़िता को वापस बुलाया गया और कथित तौर पर दोबारा हलाला के लिए मजबूर किया गया।
पीड़िता का आरोप है कि 19 फरवरी 2025 को ‘डबल हलाला’ के नाम पर मुख्य आरोपी के भाई और भतीजों ने उसके साथ सामूहिक दुष्कर्म किया। इसके बाद उसी दिन उसका एक कथित फर्जी निकाह भी कराया गया।
हाईकोर्ट ने कहा कि प्रथम दृष्टया आरोप बेहद गंभीर हैं और मामले में नाबालिग से दुष्कर्म तथा सामूहिक दुष्कर्म के संकेत मिलते हैं। इसलिए इस स्तर पर एफआईआर रद्द नहीं की जा सकती। अदालत ने साफ कहा कि आपराधिक मामलों में व्यक्तिगत कानूनों का हवाला देकर कानून की कार्रवाई से बचा नहीं जा सकता और पूरे मामले की निष्पक्ष जांच जरूरी है।
