अमरोहा। आज़ ही के दिन 3 जुलाई 1881 को लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने अंग्रेजी साप्ताहिक समाचार पत्र ‘द मराठा’ का पहला अंक प्रकाशित किया था। यह केवल एक समाचार पत्र नहीं था, बल्कि ब्रिटिश शासन के विरुद्ध राष्ट्रवादी विचारों का एक प्रभावशाली मंच था। इसी दौर में तिलक ने मराठी का ‘केसरी’ भी निकाला, जिसने आम लोगों के बीच स्वाधीनता की चेतना जगाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। भारत का स्वतंत्रता संग्राम केवल आंदोलनों, सभाओं और जेल यात्राओं तक सीमित नहीं था, बल्कि यह लड़ाई अखबारों के माध्यम से भी लड़ी गई। उस दौर की पत्रकारिता ने जनता को जागरूक किया, अंग्रेजी शासन की नीतियों को चुनौती दी और राष्ट्रीय चेतना को मजबूत किया।
स्वतंत्रता आंदोलन और सामाजिक परिवर्तन से जुड़े प्रमुख समाचार पत्रों में लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक के केसरी व द मराठा, महात्मा गांधी के यंग इंडिया, नवजीवन व हरिजन, डॉ. भीमराव अंबेडकर के मूकनायक, बहिष्कृत भारत, जनता व प्रबुद्ध भारत, श्री अरविंद के वंदे मातरम्, मौलाना अबुल कलाम आजाद के अल-हिलाल व अल-बलाग़ और गणेश शंकर विद्यार्थी के प्रताप जैसे नाम शामिल हैं। इसके अलावा अमृत बाज़ार पत्रिका, द हिंदू और द ट्रिब्यून जैसे समाचार पत्रों ने भी राष्ट्रीय चेतना जगाने और जनमत निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। ब्रिटिश सरकार इन अखबारों से इतनी परेशान थी कि अनेक संपादकों पर मुकदमे चलाए गए, प्रेस जब्त किए गए, जुर्माने लगाए गए और कई पत्रकारों को जेल भेज दिया गया, लेकिन कलम नहीं रुकी। यही निर्भीक पत्रकारिता स्वतंत्रता आंदोलन की सबसे बड़ी ताकतों में से एक बनी।
यह वर्ष भारतीय पत्रकारिता के लिए एक और कारण से ऐतिहासिक है क्योंकि 30 मई 2026 को हिंदी पत्रकारिता के 200 वर्ष पूरे हुए हैं। 30 मई 1826 को पंडित युगल किशोर शुक्ल ने कोलकाता से हिंदी का पहला समाचार पत्र ‘उदन्त मार्तण्ड’ प्रकाशित किया था। दो शताब्दियों की इस यात्रा में हिंदी पत्रकारिता ने स्वतंत्रता आंदोलन, लोकतंत्र, सामाजिक सुधार और जनसरोकारों को मजबूती देने में अमूल्य योगदान दिया है। आज जब पत्रकारिता अनेक चुनौतियों के दौर से गुजर रही है, तब उन पत्रकारों और संपादकों को याद करना और भी जरूरी हो जाता है जिन्होंने अपनी कलम को सत्ता नहीं, बल्कि समाज और राष्ट्र के प्रति जवाबदेह माना। उनकी विरासत हमें याद दिलाती है कि एक निर्भीक कलम इतिहास की दिशा बदलने की ताकत रखती है।
लेकिन आज के परिप्रेक्ष्य में इस गौरवशाली इतिहास के विपरीत एक अत्यंत दुखद और उपेक्षित पहलू भी सामने आ रहा है। वयोवृद्ध पत्रकार डॉ. संतोष गुप्ता द्वारा वर्तमान स्थिति पर गहरी चिंता व्यक्त की गई है। पश्चिम उत्तर प्रदेश के जनपदों व आंचलिक पत्रकारों की स्थिति से रूबरू डॉ संतोष गुप्ता ने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि जिला मान्यता प्राप्त पत्रकारों को लेकर सरकार का उपेक्षित रवैया देखकर बेहद अफसोस होता है। उन्होंने कहा कि पूरे देश में उत्तर प्रदेश इकलौता ऐसा पहला राज्य है जहां मान्यता प्राप्त वयोवृद्ध पत्रकारों के लिए पेंशन योजना की घोषणा तो की गई, लेकिन मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की भाजपा सरकार का दूसरा पूरा कार्यकाल खत्म होने में अब कुछ ही दिन शेष बचे हैं और यह घोषणा आज तक पूरी नहीं की जा सकी है। इससे भी अधिक संवेदनशील मामला यह है कि गंभीर बीमारियों से जूझ रहे पत्रकारों को आयुष्मान योजना का लाभ तक नहीं मिल पा रहा है।
इसी तरह उपेक्षा के चलते मुरादाबाद मंडल के डॉ. मुस्तकीम जैसे कई वरिष्ठ पत्रकार इस दुनिया से असमय रुख़सत हो गए और कुछ अन्य गंभीर रूप से बीमार पत्रकार भी आज जीवन और मृत्यु के बीच संघर्ष कर रहे हैं। पत्रकारिता की दो सौ वर्षों की इस ऐतिहासिक यात्रा के मोड़ पर आकर यह स्थिति बेहद विचारणीय है कि जिस कलम ने हमेशा समाज और राष्ट्र को दिशा दी, आज उसके रक्षक ही व्यवस्था की उदासीनता के शिकार हैं/INN
