जंतर-मंतर समेत छात्र प्रदर्शनों में हिंसा और पुलिस कार्रवाई की जांच के लिए बनी हाई पावर्ड कमेटी में बदलाव की मांग सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दी है। याचिका में कमेटी के कुछ सदस्यों की निष्पक्षता को लेकर आपत्ति जताई गई थी। अदालत ने इन आरोपों को महज आशंका और अनुमान पर आधारित बताते हुए कहा कि इन्हें साबित करने के लिए कोई ठोस या विश्वसनीय आधार सामने नहीं रखा गया है।
दरअसल, जुलाई में दिल्ली के जंतर-मंतर समेत देश के अलग-अलग हिस्सों में छात्रों ने प्रदर्शन किए थे। इस दौरान पुलिस की कार्रवाई और कथित तौर पर बल प्रयोग को लेकर सवाल उठे थे। मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व न्यायाधीश जस्टिस आर. सुभाष रेड्डी की अध्यक्षता में पांच सदस्यीय हाई पावर्ड कमेटी का गठन किया था।
कमेटी को पूरे घटनाक्रम की जांच करने के साथ पुलिस अधिकारियों की भूमिका और प्रदर्शन के दौरान हुई संपत्ति की क्षति का भी आकलन करना है।
प्रशांत भूषण ने उठाए थे कमेटी के सदस्य पर सवाल
10 सितंबर को हुई पिछली सुनवाई में वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने कमेटी के पुनर्गठन की मांग की थी। उन्होंने कमेटी में शामिल एक पूर्व डीजीपी की निष्पक्षता पर सवाल उठाते हुए कहा था कि उनके कुछ ऐसे अधिकारियों से करीबी संबंध हैं, जिनकी भूमिका जांच के दायरे में है। ऐसे में उन्होंने आशंका जताई थी कि जांच की निष्पक्षता प्रभावित हो सकती है।
इस पर चीफ जस्टिस सूर्य कांत, जस्टिस जोयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने कहा था कि कमेटी का गठन पूरी तरह विचार-विमर्श के बाद किया गया है।
अब जारी लिखित आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कमेटी की अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश कर रहे हैं। ऐसे में बिना किसी ठोस सामग्री या विश्वसनीय सबूत के कमेटी की निष्पक्षता पर सवाल उठाना उचित नहीं है। अदालत ने कहा कि कमेटी को स्वतंत्र रूप से अपना काम करने दिया जाना चाहिए।
पीड़ितों और गवाहों की सुरक्षा पर भी जोर
सुप्रीम कोर्ट ने कमेटी को जांच की प्रगति के संबंध में समय-समय पर अंतरिम रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया है। इन रिपोर्टों के आधार पर अदालत आगे आवश्यक आदेश जारी कर सकती है।
इसके अलावा कमेटी को यह भी सुनिश्चित करने को कहा गया है कि जांच के दौरान पीड़ितों और गवाहों की सुरक्षा का पूरा ध्यान रखा जाए। अदालत ने कमेटी से जल्द से जल्द अपनी जांच पूरी कर रिपोर्ट सौंपने को भी कहा है।
