दिल्ली में चुनाव आयोग के खिलाफ हुए विरोध-प्रदर्शनों के दौरान महिला पत्रकारों के साथ कथित दुर्व्यवहार का मामला अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। गुरुवार को हुई सुनवाई के दौरान अदालत ने संबंधित महिला पत्रकार को दंडात्मक कार्रवाई से सुरक्षा देने का निर्देश दिया। साथ ही, मामले की जांच के लिए स्वतंत्र समिति गठित करने के प्रस्ताव पर भी प्रथम दृष्टया सहमति जताई।
सुनवाई के दौरान अदालत को बताया गया कि प्रदर्शन के दौरान कथित छेड़छाड़ की शिकायत दिए जाने के बावजूद एफआईआर दर्ज नहीं की गई, जबकि दूसरी ओर संबंधित पुलिस अधिकारी की शिकायत पर कई लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया है। इस पर महिला पत्रकारों की सुरक्षा और उनके खिलाफ कथित प्रतिशोधात्मक कार्रवाई का मुद्दा उठाया गया।
अदालत में स्वतंत्र जांच समिति गठित करने की मांग की गई, जिसकी अध्यक्षता किसी सेवानिवृत्त महिला न्यायाधीश को सौंपने का सुझाव दिया गया। समिति में सेवानिवृत्त महिला आईपीएस अधिकारी और नागरिक समाज के प्रतिनिधियों को भी शामिल करने की बात कही गई। मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ ने इस प्रस्ताव पर शुरुआती सहमति जताते हुए प्रभावित पत्रकारों का विवरण और समिति के लिए प्रस्तावित नाम सीलबंद लिफाफों में जमा करने के निर्देश दिए।
दोनों पक्षों की शिकायतों से बढ़ा विवाद
यह पूरा मामला 3 अक्टूबर को दिल्ली में हुए विरोध-प्रदर्शन से जुड़ा है। एक महिला पत्रकार ने आरोप लगाया कि वह एक कार्यकर्ता को हिरासत में लिए जाने की घटना का वीडियो बना रही थीं, तभी एक पुलिस अधिकारी ने उनके साथ कथित तौर पर अनुचित व्यवहार किया और उन्हें धक्का दिया।
वहीं, संबंधित पुलिस अधिकारी ने अपनी शिकायत में आरोप लगाया कि प्रदर्शन के दौरान उनके खिलाफ आपत्तिजनक नारे लगाए गए और उनकी जाति को लेकर अपमानजनक टिप्पणियां की गईं। इस शिकायत के आधार पर 13 अक्टूबर को छह लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई।
सुप्रीम कोर्ट ने मामले में लगाए गए आरोपों को गंभीर बताते हुए दिल्ली पुलिस से विरोध-प्रदर्शन के दौरान लागू की गई भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 163 से संबंधित आदेश पेश करने को कहा है। केंद्र की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल ने जवाब दाखिल करने के लिए समय मांगा है।
अब मामले में स्वतंत्र जांच समिति के गठन और शिकायतों पर आगे होने वाली कार्रवाई को लेकर अदालत का अगला रुख महत्वपूर्ण होगा।
