सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रपति के रेफरेंस पर फैसला सुनाते हुए कहा कि अनुच्छेद 200 और 201 के तहत राज्यपाल के पास मूल रूप से तीन ही विकल्प उपलब्ध हैं- बिल को मंजूरी देना, रोकना या राष्ट्रपति के लिए सुरक्षित रखना. अदालत ने स्पष्ट किया कि पहले प्रावधान को चौथा विकल्प नहीं माना जा सकता. अदालत ने कहा कि जब दो व्याख्याएं संभव हों, तो वह व्याख्या अपनाई जानी चाहिए जो संवैधानिक संस्थाओं के बीच संवाद और सहयोग को बढ़ावा दे. कोर्ट ने टिप्पणी की कि भारतीय संघवाद की किसी भी परिभाषा में यह स्वीकार्य नहीं होगा कि राज्यपाल किसी बिल को बिना सदन को वापस भेजे अनिश्चितकाल तक रोके रखें. राष्ट्रपति के लिए बिल सुरक्षित रखना भी संस्थागत संवाद का हिस्सा है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों को टकराव या बाधा पैदा करने के बजाय संवाद और सहयोग की भावना को अपनाना चाहिए.
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में राज्यपाल के लिए समयसीमा तय करना संविधान की ओर से दी गई लचीलेपन की भावना के खिलाफ है. पीठ ने स्पष्ट किया कि राज्यपाल के पास केवल तीन संवैधानिक विकल्प हैं- बिल को मंजूरी देना, बिल को दोबारा विचार के लिए विधानसभा को लौटाना या उसे राष्ट्रपति के पास भेजना. राज्यपाल बिलों को अनिश्चितकाल तक रोककर विधायी प्रक्रिया को बाधित नहीं कर सकते. सुप्रीम कोर्ट ने यह भी माना कि न्यायपालिका कानून बनाने की प्रक्रिया में हस्तक्षेप नहीं कर सकती, लेकिन यह स्पष्ट किया कि- ‘बिना वजह की अनिश्चित देरी न्यायिक जांच के दायरे में आ सकती है.’
