कांशीराम द्वारा स्थापित और मायावती के नेतृत्व में फली-फूली बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के लिए साल 2025-26 एक काले अध्याय की तरह आने वाला है। 1989 के बाद यह पहली बार होगा जब संसद के गलियारों में बसपा की नीली धमक सुनाई नहीं देगी। तीन दशकों से अधिक समय तक भारतीय राजनीति के केंद्र में रहने वाली यह पार्टी अब अपने सबसे खराब दौर से गुजर रही है, जहाँ लोकसभा के बाद अब राज्यसभा से भी उसका पत्ता साफ होने वाला है।
अंकगणित का बिगड़ता खेल
बसपा की इस बदहाली की पटकथा 2024 के लोकसभा चुनावों में ही लिख दी गई थी, जब पार्टी को एक भी सीट हासिल नहीं हुई। वर्तमान में संसद में बसपा का प्रतिनिधित्व केवल राज्यसभा सांसद रामजी गौतम के रूप में बचा है। उनका कार्यकाल नवंबर 2026 में समाप्त हो जाएगा। उत्तर प्रदेश विधानसभा में बसपा के पास केवल एक विधायक है, जबकि राज्यसभा की एक सीट जीतने के लिए लगभग 37 विधायकों के समर्थन की जरूरत होती है। ऐसे में किसी भी नए सदस्य का चुना जाना नामुमकिन है।
जनाधार का खिसकता ग्राफ
पार्टी की इस दुर्दशा के पीछे वोट बैंक में आई भारी गिरावट सबसे बड़ी वजह है। कभी उत्तर प्रदेश की सत्ता पर पूर्ण बहुमत से राज करने वाली बसपा का वोट शेयर 2024 में गिरकर मात्र 9.39% (उत्तर प्रदेश में) रह गया है। दलित और पिछड़ा वर्ग के वोट बैंक में अन्य पार्टियों की सेंधमारी ने मायावती के ‘सोशल इंजीनियरिंग’ के किले को ढहा दिया है। यह न केवल सीटों का नुकसान है, बल्कि पार्टी के राष्ट्रीय दर्जे पर भी बड़ा खतरा है।
2026: एक पूर्ण शून्य की ओर
नवंबर 2026 के बाद जब रामजी गौतम सदन से विदा होंगे, तो बसपा का स्कोरबोर्ड ‘जीरो’ हो जाएगा। यह स्थिति 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से ठीक पहले पार्टी के मनोबल के लिए एक बड़ा झटका होगी। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि पार्टी ने अपने संगठनात्मक ढांचे और रणनीति में आमूल-चूल बदलाव नहीं किया, तो संसद से शुरू हुआ यह ‘शून्य’ का सफर राज्यों की राजनीति में भी पार्टी को हाशिए पर धकेल सकता है।
