अमरोहा। कल्कि पीठाधीश्वर आचार्य प्रमोद कृष्णम ने यूजीसी के नए नियमों को लेकर उत्पन्न हुई आशंकाओं पर चिंता जताते हुए कहा कि इनका शीघ्र निराकरण किया जाना चाहिए। उन्होंने लोगों से संयम और संवेदनशीलता बरतने का आह्वान करते हुए कहा कि ऐसा कोई भी निर्णय उचित नहीं हो सकता, जो समाज में विभाजन पैदा करे।
आचार्य प्रमोद कृष्णम गुरुवार को मंडी धनौरा में आयोजित हिंदू महासम्मेलन में शामिल होने पहुंचे थे। इस दौरान उन्होंने पत्रकारों से बातचीत में यूनीवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (यूजीसी) के नए नियमों पर अपनी प्रतिक्रिया दी। गौरतलब है कि यूजीसी द्वारा 13 जनवरी को अधिसूचित किए गए नए नियम “प्रमोशन ऑफ इक्विटी इन हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशंस रेगुलेशन–2026” को लेकर देशभर में विरोध देखने को मिला है। इन नियमों के तहत कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में एससी, एसटी और ओबीसी वर्ग के छात्रों के साथ जातीय भेदभाव रोकने के लिए कई प्रावधान किए गए हैं।

सुप्रीम कोर्ट की रोक और सरकार की समिति
नियमों को लेकर बढ़ते विरोध के बीच केंद्र सरकार ने समाधान के लिए उच्चस्तरीय समिति गठित करने का निर्णय लिया है। वहीं गुरुवार को सर्वोच्च न्यायालय ने यूजीसी के इन नियमों पर अगले आदेश तक रोक लगा दी है। इस संदर्भ में आचार्य प्रमोद कृष्णम ने कहा कि वर्तमान समय में देश की एकता सर्वोपरि है। उन्होंने कहा कि कुछ ताकतें देश को जाति, धर्म और वर्गों में बांटने की साजिश कर रही हैं, जिसे किसी भी कीमत पर सफल नहीं होने दिया जाना चाहिए।
पारदर्शिता और संवाद पर दिया जोर
आचार्य प्रमोद कृष्णम ने कहा कि सरकार द्वारा आगे जो भी नियम या कानून बनाए जाएं, उन्हें सभी पक्षों से व्यापक चर्चा और पूर्ण पारदर्शिता के साथ लागू किया जाना चाहिए, ताकि किसी प्रकार की भ्रांति या असमंजस की स्थिति उत्पन्न न हो।

उन्होंने सवाल उठाया कि यदि यूजीसी के नए नियम पूरी तरह न्यायसंगत हैं, तो उनका इतना व्यापक विरोध क्यों हो रहा है। उन्होंने आशंका जताई कि इन नियमों से सामान्य वर्ग के शिक्षकों और छात्रों के लिए नई समस्याएं खड़ी हो सकती हैं, जबकि सरकार का दावा है कि नियमों में झूठी जातिगत शिकायतों पर दंड का कोई प्रावधान नहीं है।
आचार्य प्रमोद कृष्णम ने कहा कि समाज को जोड़ने वाले निर्णय ही राष्ट्रहित में होते हैं और किसी भी प्रकार का ऐसा कदम, जिससे सामाजिक समरसता प्रभावित हो, उस पर पुनर्विचार आवश्यक है।
