अमरोहा। भारतीय किसान यूनियन (भाकियू) संयुक्त मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नरेश चौधरी ने केंद्र सरकार की नीतियों पर तीखा हमला बोलते हुए कहा है कि “जहर की खेती रोकने” के नाम पर अब खेती को और अधिक महंगा बनाने की तैयारी की जा रही है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार एक बार फिर किसानों पर नीतिगत प्रयोग कर रही है, जिसका सीधा बोझ किसान की जेब पर पड़ेगा।
नरेश चौधरी ने संसद में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा प्रस्तुत आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 का हवाला देते हुए कहा कि सर्वेक्षण में उर्वरकों के असंतुलित उपयोग को कम करने और मृदा स्वास्थ्य सुधारने के नाम पर यूरिया की कीमतें बढ़ाने की सिफारिश की गई है। इसके साथ ही किसानों को संतुलित उर्वरक उपयोग के लिए प्रति एकड़ नकद सहायता जैसे वित्तीय प्रोत्साहन देने का प्रस्ताव रखा गया है।
पहले महंगाई, फिर प्रोत्साहन का लालच
भाकियू नेता ने इसे सरकार की “स्पष्ट चाल” करार देते हुए कहा कि पहले यूरिया को महंगा किया जाएगा और फिर उसी बढ़े हुए बोझ को सहने के लिए किसानों को प्रोत्साहन का लालच दिया जाएगा। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या खेती सुधारने का रास्ता कीमतें बढ़ाने से होकर जाता है, या फिर असली सुधार नीति, व्यवस्था और भ्रष्ट तंत्र को ठीक करने से आएगा।
नरेश चौधरी ने कहा कि सरकार हर बार की तरह एक बार फिर किसानों को प्रयोगशाला बना रही है, जो बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। उन्होंने चेतावनी दी कि यूरिया, जिसकी कीमत वर्ष 2018 से ₹242 प्रति 45 किलोग्राम बैग पर स्थिर है, यदि महंगा किया गया तो किसानों की लागत में भारी इजाफा होगा।
नकद सहायता से नहीं सधेगी खेती
उन्होंने कहा कि मिट्टी के स्वास्थ्य सुधार के नाम पर प्रस्तावित नकद सहायता किसानों के लिए पर्याप्त नहीं होगी। सरकार को चाहिए कि वह उर्वरक सब्सिडी व्यवस्था में पारदर्शिता लाए, भ्रष्टाचार पर रोक लगाए और किसानों को संतुलित उर्वरक उपयोग के प्रति जागरूक करे, न कि कीमतें बढ़ाकर उन पर अतिरिक्त बोझ डाले।
गौरतलब है कि आर्थिक सर्वेक्षण में देश की मिट्टी की गिरती गुणवत्ता और एनपीके अनुपात के गंभीर असंतुलन पर चिंता जताई गई है। वर्तमान में यह अनुपात लगभग 10.9:4.1:1 बताया गया है, जबकि आदर्श अनुपात 4:2:1 के करीब माना जाता है। सर्वेक्षण में यूरिया के अत्यधिक उपयोग को इसका प्रमुख कारण बताया गया है।
भाकियू संयुक्त मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष ने स्पष्ट किया कि किसान पर्यावरण और मिट्टी संरक्षण के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन किसी भी नीति का भार किसान की जेब पर डालना स्वीकार्य नहीं होगा।
