अमरोहा। जिले के गजरौला औद्योगिक क्षेत्र, विशेषकर नाईपुरा इलाके में स्थित रासायनिक कारखानों से निकलने वाले जहरीले उत्सर्जन और अपशिष्ट से हवा, मिट्टी और भूजल गंभीर रूप से प्रदूषित हो रहे हैं। लंबे समय से जारी यह प्रदूषण अब स्थानीय जीवन, कृषि और पारिस्थितिकी तंत्र पर गहरा असर डाल रहा है, लेकिन अब तक इस समस्या पर प्रभावी नियंत्रण नहीं हो पाया है।

बताया जा रहा है कि कारखानों से निकलने वाले रासायनिक कचरे के कारण बगद नदी सहित आसपास के जल स्रोत भी दूषित हो चुके हैं। नाईपुरा, बसैली और शहबाजपुर डोर गांवों में हैंडपंप और ट्यूबवेल से पीला, बदबूदार और रसायनयुक्त पानी निकलने की शिकायतें सामने आ रही हैं। इससे जहां किसानों की फसलें खराब हो रही हैं, वहीं दुधारू पशुओं और ग्रामीणों के स्वास्थ्य पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है।

भारतीय किसान यूनियन (भाकियू) संयुक्त मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नरेश चौधरी ने कहा कि प्रदूषण का असर अब जैव विविधता पर भी स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा है। हसनपुर और सिहाली जागीर जैसे जैव समृद्ध क्षेत्रों में पेड़-पौधों और फूलों के प्राकृतिक चक्र में बदलाव देखा जा रहा है। बदलती जलवायु, बढ़ते तापमान, अनियमित वर्षा और रासायनिक प्रदूषण के संयुक्त प्रभाव से उष्णकटिबंधीय पौधों में फूल खिलने का समय असामान्य रूप से आगे-पीछे हो रहा है।
प्रदेशाध्यक्ष रामकृष्ण चौहान ने बताया कि आम सहित अन्य फलदार पेड़ों पर अब पहले जैसी पैदावार नहीं हो रही है और कई जगहों पर फल लगना भी कम हो गया है। इसके साथ ही पक्षियों का उपवनों से पलायन भी देखने को मिल रहा है।
अल्पसंख्यक मोर्चा प्रभारी एवं मंडलाध्यक्ष एहसान अली ने कहा कि यह बदलाव पारिस्थितिकी तंत्र के नाजुक संतुलन को प्रभावित कर रहा है। फूलों के खिलने और परागण करने वाले कीटों के बीच तालमेल बिगड़ने से बीज और फल उत्पादन घट रहा है, जिससे उस पर निर्भर पक्षियों, जानवरों और पूरे खाद्य तंत्र पर असर पड़ रहा है।

स्थानीय किसानों का आरोप है कि कारखानों का प्रदूषण जंगलों और आसपास के क्षेत्रों पर ‘जलवायु परिवर्तन का साया’ बनकर छा गया है। बावजूद इसके, मुख्य जंगलों में निगरानी की कमी है और प्रदूषण से जुड़े ठोस आंकड़े भी उपलब्ध नहीं हैं।

प्रदूषण के खिलाफ किसानों का धरना बृहस्पतिवार को 75वें दिन भी जारी रहा। ग्रामीणों का कहना है कि वे लंबे समय से इस समस्या को झेल रहे हैं, लेकिन समाधान की दिशा में ठोस कदम नहीं उठाए गए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि प्रकृति की बदलती लय को समझकर तत्काल संरक्षण के उपाय करना जरूरी है, अन्यथा पारिस्थितिकी तंत्र का संतुलन गंभीर रूप से प्रभावित हो सकता है।
धरने में श्रीमती कृष्णा, श्रीमती दयावती, श्रीमती जयश्री, श्रीमती देवुंद्री, श्रीमती सीमा, श्रीमती भगवती, श्रीमती भूरिया, श्रीमती कश्मीरी, श्रीमती नूरजहां, श्रीमती होमवती, श्रीमती लीलुम, श्रीमती संतोष, अंकित, ओमप्रकाश, समरपाल, राम प्रसाद, रामसरन, मंसूर अली, रामवीर, रमेश सैनी, पार्थी, प्रकाश सैनी, रामफल, तेजपाल, होमपाल, गंगाराम और अशद अली सहित क्षेत्र के अनेक किसान मौजूद रहे।
