ग्रामीण भारत के जिले से।(विशेष समीक्षा ) सुना है, सही वाले जिला पत्रकार बनने चले हो?
तो सुन लो… ज़िंदा तो ज़रूर रहोगे, लेकिन शायद कभी जी नहीं पाओगे।
यह कोई काव्यात्मक चेतावनी नहीं, बल्कि 2026 के भारत में जिला स्तर के पत्रकारों, फोटोग्राफरों और कैमरामैनों की कड़वी वास्तविकता है। कलम उठाने से पहले सौ बार सोचना पड़ता है, लिख देने के बाद हजार बार घेर लिया जाता है। तालियाँ बहुत कम मिलती हैं, तंज़ ज़्यादा। सम्मान से पहले शक की नज़रें आती हैं। जो सच के साथ खड़ा होता है, उसे अक्सर अकेले ही लड़ना पड़ता है।
आज जब “स्टार एंकर” और बड़े संपादक एयरकंडीशनर कमरों या स्टूडियो में “राष्ट्रहित”, “नेशन फर्स्ट” या “मोदी बनाम राहुल” का ड्रामा रच रहे हैं, तब जिला का पत्रकार पुरानी बाइक या साइकिल पर “PRESS” का बोर्ड लगाए, परिवार चला रहा है। खतरे झेल रहा है। रातों की नींद उड़ चुकी है। कई पुराने रिश्ते टूट चुके हैं। परिवार पूछ रहा है “भाई, क्या जरूरत थी इस चक्कर में पड़ने की?”
फिरोज गांधी का 1956 का ऐतिहासिक कानून, प्रेस स्वतंत्रता की नींव, आज सिर्फ किताबों में?
1956 में कांग्रेस सांसद फिरोज गांधी ने संसद में निजी सदस्य विधेयक पेश किया, जिसके बाद संसदीय कार्यवाही (प्रकाशन का संरक्षण) अधिनियम, 1956 बना। उद्देश्य स्पष्ट था मीडिया को संसद की कार्यवाही की सही और निडर रिपोर्टिंग की स्वतंत्रता देना। भ्रष्टाचार के खिलाफ और प्रेस की आजादी के लिए एक साहसी कदम। इस कानून ने भारतीय लोकतंत्र में प्रेस को मजबूती दी थी।
लेकिन 70 साल बाद 2026 में स्थिति क्या है?
वर्किंग जर्नलिस्ट्स एंड अदर न्यूजपेपर एम्प्लॉयीज़ एक्ट, 1955 (जिसके तहत वेज बोर्ड बनता था) को नये लेबर कोड्स (खासकर Occupational Safety, Health and Working Conditions Code, 2020) के तहत 2025-26 में प्रभावी रूप से समाप्त कर दिया गया है। विशेष प्रावधानों की जगह अब सामान्य फ्रेमवर्क आ गया है, जिससे जिला स्तर के पत्रकारों की मजबूत सुरक्षा और वेतन निर्धारण की पुरानी व्यवस्था कमजोर पड़ गई है। फिरोज गांधी प्रेस काउंसिल या वेज बोर्ड की बात तो दूर, बड़े-बड़े “स्टार पत्रकार”, एंकर, संपादक, मीडिया मालिक और नेता सब चुप हैं। चाहे कोई भी सरकार हो।
हाल ही में नोएडा में हजारों मजदूरों ने न्यूनतम वेतन बढ़ाने, बेहतर काम की स्थिति और महिलाओं की सुरक्षा की मांग को लेकर सड़कें जाम कीं। राज्य सरकार को अंतरिम वेतन वृद्धि करनी पड़ी। लेकिन उसी समय ज्यादातर बड़े मीडिया घराने चुप रहे। क्योंकि उनके लिए पत्रकारिता अब स्टूडियो का शोहरत और पावर का खेल है, न कि जमीनी मुद्दों की आवाज़।
जिला संवाददाता, फ्रीलांसर, फोटोग्राफर इनके लिए वेतन, सुरक्षा, सम्मान और अधिकार “छोटे मुद्दे” माने जाते हैं। बड़े पत्रकार अच्छी सैलरी, सरकारी सुविधाएँ, मालिकों की दावतों में सुपर पावर नेताओं की मौजूदगी का नशा भोग रहे हैं। जबकि जमीनी पत्रकार अभी भी खतरे झेल रहा है बिना पर्याप्त सुरक्षा, बिना उचित वेतन, बिना सामाजिक सुरक्षा।
आज का सबसे बड़ा मजाक, संवाद सूत्र, विज्ञापनी पत्रकारिता या नैरेटिव मैनेजमेंट?
दरअसल, आजकल “पत्रकारिता” का सबसे बड़ा मजाक यही है। बड़े मीडिया घराने अब खबर नहीं, नैरेटिव मैनेज करते हैं। जिला स्तर पर काम करने वाले पत्रकारों की मेहनत, उनकी तनख्वाह, उनके अधिकार और सुरक्षा ये मुद्दे उनके एजेंडे में कहीं नहीं दिखते। वे सुविधा भोग रहे हैं, जबकि जिला का पत्रकार सच की आग में जल रहा है।
अन्याय देखकर खून खौलता है, गलत के खिलाफ आवाज़ उठाने का हौसला है तो यह रास्ता सचमुच जीना सिखा देगा। लेकिन आसान बिल्कुल नहीं होगा। अगर टिक गए, तो तुम सिर्फ खुद ज़िंदा नहीं रहोगे… दूसरों को भी जीना सिखा दोगे।
जिस दिन बड़े मीडिया घराने और “स्टार पत्रकार” वास्तविक पत्रकारों, खासकर जिला स्तर के हक, वेतन, सुरक्षा और नए लेबर कोड्स के प्रभाव की बात करेंगे, उसी दिन समझना कि कुछ सकारात्मक बदलाव आ रहा है।
अभी तो ज्यादातर लोग सिर्फ “ज़िंदा” हैं, जीने का हौसला बहुत कम बचा है।
अंत में
जिला पत्रकारिता की दशा आज भी निहत्थी जंग जैसी है। लेकिन दिशा अभी भी उसी सच्चाई में छिपी है जिसकी फिरोज गांधी ने 1956 में कल्पना की थी — बिना डर, बिना समझौते की पत्रकारिता।
अगर इस रास्ते पर जाना है, तो खुद को धोखा मत देना।
क्योंकि यहाँ शोहरत नहीं, सिर्फ सच की कीमत चुकानी पड़ती है।
(यह समीक्षात्मक स्टोरी जिला स्तर के पत्रकारों की वर्तमान वास्तविकता, 1955-56 के ऐतिहासिक कानूनों और 2025-26 के नए लेबर कोड्स के संदर्भ पर आधारित है।1955 एक्ट और वेज बोर्ड की स्थिति को 2026 के संदर्भ में नए लेबर कोड्स के प्रभाव में अपडेट किया गया है)
(राजेन्द्र सिंह से उद्धृत अंश सहित मुरादाबाद/ अमरोहा के विद्वत प्रेस ट्रस्ट आफ इंडिया पीटीआई के दिवंगत पत्रकार डॉ मुस्तकीम साहब को समर्पित)
