मुरादाबाद/अमरोहा। लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के रूप में पहचानी जाने वाली पत्रकारिता आज वैश्विक और स्थानीय दोनों स्तरों पर गंभीर चुनौतियों और सवालों के घेरे में है। हाल ही में नॉर्वे की राजधानी ओस्लो में भारतीय प्रधानमंत्री के दौरे के दौरान एक विदेशी महिला पत्रकार द्वारा प्रेस की स्वतंत्रता और जवाबदेही को लेकर पूछे गए तीखे सवालों ने देश के भीतर एक नई बहस छेड़ दी है।
नॉर्वे की पत्रकार हेले लिंग ने भारत में प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक में गिरावट और लंबे समय से खुली प्रेस वार्ता न होने पर सवाल उठाए, जिसके बाद सोशल मीडिया से लेकर गलियारों तक प्रोपेगेंडा और लोकतांत्रिक अधिकारों के बीच वैचारिक युद्ध छिड़ गया है।
पत्रकार ने तर्क दिया कि सत्ता से प्रश्न करना ही पत्रकारिता का मूल धर्म है, जबकि समर्थकों द्वारा इसे पूर्व नियोजित एजेंडा करार दिया जा रहा है।
गौरतलब है कि नार्वे प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक में दुनिया में पहले स्थान पर है, जबकि भारत 157 वें नंबर पर है, फिलिस्तीन, यूएई और क्यूबा जैसे देशों के साथ। राष्ट्रीय स्तर की इस गूँज का असर उत्तर प्रदेश के जनपदों में भी स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है, जहाँ स्थानीय पत्रकार सूचनाओं के अभाव और प्रशासनिक उपेक्षा से जूझ रहे हैं। वरिष्ठ पत्रकारों का मानना है कि जहां प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ खुद जनपदीय दौरे पर पत्रकार वार्ता नहीं करते वहीं पिछले कुछ वर्षों में समाचारों की पुष्टि के लिए अधिकारियों से संपर्क करना कठिन हो गया है और सीयूजी नंबरों पर प्रतिक्रिया न मिलना एक सामान्य प्रक्रिया बन चुकी है।
मान्यता प्राप्त पत्रकारों की स्थाई समिति की बैठकों से लेकर जनप्रतिनिधियों की ब्रीफिंग तक, संवाद अब केवल एकतरफा सूचना प्रवाह बनकर रह गया है। यह स्थिति न केवल सूचना के अधिकार को कमजोर कर रही है, बल्कि पत्रकारों के भीतर असुरक्षा का भाव भी पैदा कर रही है। जनपदीय पत्रकारिता के विकास में बाधक तथा सत्ता से सुविधाएं जुटाने में स्वघोषित राज्य मालिक पत्रकारिता में दिल कुशा, बटलर पैलेस में मकान दबाए मठाधीशों का दौर अभी जारी है। इस असमानता को ख़त्म कर समावेशी पत्रकारिता जरूरी है ।
वरिष्ठ पत्रकारों के अनुसार पत्रकारिता का दायित्व समय के अनुसार समाज के हितों को समझना और उन्हें अभिव्यक्ति देना है।समाज के प्रति जवाबदेह जनपदीय पत्रकारिता सदैव समाज की चिकित्सा करती आई है। लेकिन आज़ कहीं आलोचनात्मक दृष्टि कमज़ोर पड़ती दिखाई दे रही है। भारत और लोकतंत्र के हित में सच को कहना और सुनना आवश्यक है।
लोकतंत्र केवल तालियों और इवेंट मैनेजमेंट से नहीं बल्कि कठिन सवालों और पारदर्शी जवाबदेही से ही जीवंत रहता है। असहमति प्रगति के लिए जरूरी है। क्योंकि विचारों का टकराव ही समाज को आगे बढ़ाता है।यदि प्रश्न पूछने की परिपाटी समाप्त होती है, तो यह स्वस्थ समाज के लिए एक चिंताजनक संकेत है। पत्रकारों को बिना किसी डर , सेंसरशिप या निगरानी में काम करने का सुरक्षित माहौल मिले , ताकि लोकतंत्र का चौथा स्तंभ मजबूती से खड़ा रहे।
( संप्रति: यूएनआई में मुरादाबाद अमरोहा संवाददाता तथा मान्यता प्राप्त पत्रकार समिति अमरोहा के जिलाध्यक्ष)
