अमरोहा। किसान क्रांति के महानायक विजय सिंह पथिक कहते थे कि सच्चा क्रांतिकारी वही है जो हाशिए पर खड़े व्यक्ति की आवाज बने ।
भारतीय स्वाधीनता संग्राम के इतिहास में विजय सिंह पथिक एक ऐसे दैदीप्यमान नक्षत्र हैं, जिनकी चमक ने न केवल ब्रिटिश सत्ता को दहला दिया, बल्कि सामंती दमन के विरुद्ध किसानों को एक शक्तिशाली हथियार प्रदान किया। पथिक जी केवल एक व्यक्ति नहीं बल्कि एक विचार थे, जिन्होंने “यश वैभव सुख की चाह नहीं” के मूल मंत्र को अपने जीवन में चरितार्थ किया। उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर जिले के गुठावली गाँव में जन्मे भूप सिंह (बचपन का नाम) ने राजस्थान को अपनी कर्मभूमि बनाया और यहाँ के किसानों के दुःख-दर्द को अपनी लेखनी और संगठन क्षमता से स्वर दिया। उन्होंने रासबिहारी बोस और सचिंद्रनाथ सान्याल जैसे क्रांतिकारियों के साथ सशस्त्र विद्रोह की योजना बनाई, किंतु जब परिस्थितियां बदलीं, तो उन्होंने अपना नाम बदलकर ‘विजय सिंह पथिक’ कर लिया और अहिंसक किसान आंदोलनों की नींव रखी।
विजय सिंह पथिक का नाम आते ही ‘बिजोलिया किसान आंदोलन’ का चित्र स्वतः ही उभर आता है। यह आंदोलन इतिहास का वह पन्ना है जहाँ पथिक जी ने पहली बार संगठित किसान शक्ति का प्रदर्शन किया। वर्ष 1916 में उन्होंने इस आंदोलन का नेतृत्व संभाला और ‘राजस्थान सेवा संघ’ के माध्यम से किसानों को उनके अधिकारों के प्रति सचेत किया। पथिक जी ने समझा कि किसानों की समस्या केवल लगान नहीं, बल्कि लाटा-कुंता और बेगार जैसी कुप्रथाएं भी हैं। उन्होंने चंवरी कर और तलवार बंधाई जैसे अनुचित करों के विरुद्ध ग्रामीणों को एकजुट किया। उनके कुशल नेतृत्व का ही परिणाम था कि महात्मा गांधी ने भी उनके कार्यों की सराहना करते हुए उन्हें ‘असली सत्याग्रही’ माना। पथिक जी ने बिजोलिया को स्वावलंबन और प्रतिरोध का ऐसा केंद्र बनाया जिसने आगे चलकर बेगू और बूंदी जैसे किसान आंदोलनों को भी ऊर्जा प्रदान की।
पथिक जी केवल रणक्षेत्र के सेनानी नहीं थे, बल्कि वे एक प्रखर पत्रकार और साहित्यकार भी थे। उनका मानना था कि जब तक जनता जागरूक नहीं होगी, तब तक क्रांति अधूरी है। इसी उद्देश्य से उन्होंने ‘नवीन राजस्थान’ और ‘राजस्थान केसरी’ जैसे समाचार पत्रों का संपादन किया। कानपुर से प्रकाशित होने वाले गणेश शंकर विद्यार्थी के ‘प्रताप’ अखबार के माध्यम से उन्होंने बिजोलिया की गूंज को राष्ट्रीय स्तर तक पहुँचाया। उनके लेखों में तार्किकता और ब्रिटिश नीतियों का गहरा विश्लेषण होता था, जो युवाओं के भीतर राष्ट्रप्रेम की ज्वाला प्रज्वलित करता था। उनकी कविताओं में संघर्ष की जो ध्वनि सुनाई देती है, वह आज भी पथिकों को प्रेरणा देती है कि जीवन रहे न रहे, पर संसार में स्वेच्छाचार और दमन का अंत होना अनिवार्य है।
राजनीतिक आजादी के साथ-साथ पथिक जी सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध भी सक्रिय रहे। उन्होंने शिक्षा के प्रसार और महिलाओं की स्थिति सुधारने पर विशेष बल दिया। अजमेर को केंद्र बनाकर उन्होंने राजस्थान के सामाजिक-राजनीतिक परिदृश्य को पूरी तरह बदल दिया। उनका जीवन सादगी की मिसाल था, जहाँ उन्होंने स्वयं के लिए कभी किसी पद या सम्मान की लालसा नहीं की। आज उनकी पुण्यतिथि पर, जब हम उनके जुझारू चेहरे को देखते हैं, तो हमें बोध होता है कि एक सच्चा क्रांतिकारी वही है जो हाशिए पर खड़े व्यक्ति की आवाज बने। विजय सिंह पथिक भारतीय किसान राजनीति के वह आधार स्तंभ हैं, जिनके बिना आधुनिक भारत के निर्माण का इतिहास अधूरा है। उनके त्याग और तपस्या को नमन करना केवल एक रस्म नहीं, बल्कि उनके आदर्शों को जीवित रखने का संकल्प है।
@वरिष्ठ पत्रकार महिपाल सिंह का आलेख
