पश्चिम बंगाल विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष की नियुक्ति को लेकर चल रहे विवाद में कलकत्ता हाईकोर्ट ने फिलहाल कोई अंतरिम राहत देने से इनकार कर दिया है। अदालत के इस फैसले के बाद विधानसभा अध्यक्ष द्वारा ऋतब्रत बनर्जी को नेता प्रतिपक्ष नियुक्त किए जाने का निर्णय यथावत बना रहेगा।
यह मामला तब सामने आया जब तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के वरिष्ठ नेता शोभनदेब चट्टोपाध्याय ने विधानसभा अध्यक्ष रथींद्र बसु के उस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी, जिसमें पार्टी के बागी विधायक ऋतब्रत बनर्जी को नेता प्रतिपक्ष के रूप में मान्यता दी गई थी। टीएमसी के भीतर नेता प्रतिपक्ष पद के लिए दो अलग-अलग नाम भेजे गए थे। पार्टी नेतृत्व समर्थक गुट ने शोभनदेब चट्टोपाध्याय का नाम प्रस्तावित किया था, जबकि बागी विधायकों के गुट ने ऋतब्रत बनर्जी के नाम का समर्थन किया था।
गुरुवार को सुनवाई के दौरान जस्टिस कृष्ण राव ने स्पष्ट किया कि अदालत इस स्तर पर कोई अंतरिम आदेश पारित नहीं करेगी। कोर्ट ने सभी पक्षों को दो सप्ताह के भीतर अपने जवाब और विरोध में हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया है। मामले की अगली सुनवाई 28 जुलाई को निर्धारित की गई है।
टीएमसी सांसद और वरिष्ठ अधिवक्ता कल्याण बनर्जी ने अदालत के आदेश पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि हाईकोर्ट ने याचिका स्वीकार कर ली है, लेकिन अंतरिम राहत नहीं दी है। अब मामले की अंतिम सुनवाई में सभी पक्षों की दलीलों पर विस्तार से विचार किया जाएगा।
इससे पहले सुनवाई के दौरान अदालत ने यह महत्वपूर्ण सवाल उठाया था कि यदि किसी एक राजनीतिक दल की ओर से नेता प्रतिपक्ष के लिए दो अलग-अलग नाम भेजे जाएं, तो ऐसी स्थिति में विधानसभा अध्यक्ष की संवैधानिक और वैधानिक जिम्मेदारी क्या होगी। इस पर अध्यक्ष की ओर से पेश अधिवक्ता बिल्वदल भट्टाचार्य ने दलील दी थी कि पश्चिम बंगाल विधानसभा परिलब्धियां अधिनियम, 1937 के तहत नेता प्रतिपक्ष वही सदस्य माना जाएगा जिसे सदन में सबसे बड़े विपक्षी दल के नेता के रूप में मान्यता प्राप्त हो। उन्होंने यह भी कहा कि ऐसे विवादों में अध्यक्ष का निर्णय अंतिम और बाध्यकारी होता है।
वहीं, इस पूरे विवाद के बीच कथित फर्जी हस्ताक्षरों का मामला भी सुर्खियों में है। आरोप है कि शोभनदेब चट्टोपाध्याय के समर्थन में भेजे गए प्रस्ताव पत्र पर कुछ विधायकों के हस्ताक्षर फर्जी तरीके से दर्ज किए गए। इस मुद्दे को सबसे पहले ऋतब्रत बनर्जी और संदीपन साहा ने उठाया था, जिसके बाद मामला और तूल पकड़ गया।
शिकायत मिलने के बाद विधानसभा सचिवालय की ओर से एफआईआर दर्ज कराई गई और मामले की जांच पश्चिम बंगाल सीआईडी को सौंप दी गई। जांच एजेंसी संबंधित विधायकों के बयान दर्ज कर रही है और हस्ताक्षरों के नमूनों की भी जांच की जा रही है।
