अमरोहा। स्वतंत्रता के 80 वर्ष बाद भी जनपदीय पत्रकार उपेक्षित है। अब समय आ गया है जनपदीय पत्रकारिता को औपचारिक रूप से समाप्त घोषित करने का ऐलानंकर ही दिया जाए।
आज देश अपनी आज़ादी के अस्सी वर्ष पूरे कर रहा है, मगर एक सवाल मन को बार-बार कचोटता है कि आखिर जनपद स्तर पर काम करने वाला पत्रकार आज भी अपने ही समाज, अपने ही परिजनों और अपने ही तंत्र से उपेक्षा का शिकार क्यों है। परिवार वाले समझते हैं कि पत्रकारिता में कुछ रखा नहीं, नाते-रिश्तेदार तंज कसते हैं, बिखरे समाज से हक़ में आवाज़ उठाने या सम्मान की उम्मीद नहीं है , और जनप्रतिनिधि, नौकरशाह व सरकारें बस इस्तेमाल करना जानती हैं। यह अनुभव किसी किताब से नहीं, बरसों की जमीनी सच्चाई से निकला है।
उत्तर प्रदेश शायद देश का इकलौता ऐसा राज्य है जहां मुख्यमंत्री द्वारा घोषित पेंशन तक आज तक पूरी तरह लागू नहीं हो सकी। यह किसी एक मुख्यमंत्री की भूल नहीं, बल्कि पूरे तंत्र की उस मानसिकता का प्रतिबिंब है जो जनपद पत्रकार को कभी गंभीरता से लेती ही नहीं। जबकि दिल्ली और लखनऊ जैसी राजधानियों में बैठे स्थापित पत्रकार बरसों से सरकारी आवास और तमाम सुविधाएं भोगते आ रहे हैं, सवाल यह है कि अस्सी वर्षों में इन्होंने ऐसा उल्लेखनीय क्या कर दिया जिससे आम आदमी, राजनेता या नौकरशाह की सोच और मानसिकता में कोई बड़ा बदलाव आया हो। सच तो यह है कि जनपद पत्रकारों की आज की दुर्दशा के सबसे बड़े जिम्मेदार यही राजधानी-केंद्रित पत्रकार वर्ग है, जिसने कभी अपने जमीनी साथियों की सुध नहीं ली।
आज तक किसी भी सरकार ने बड़े मीडिया घरानों पर आरएनआई, ईडी, सीबीआई या ऑडिट जैसी कोई सख्ती लागू नहीं की, न वेज बोर्ड की सिफारिशें ईमानदारी से लागू हुईं। यह किसी एक व्यवस्था की खामी नहीं, बल्कि जानबूझकर बनाई गई चुप्पी है। दूसरी ओर पत्रकारिता पढ़ाने वाले बड़े राष्ट्रीय संस्थानों से लेकर छोटे-छोटे कोर्स कराने वाले संस्थानों तक में, हर जगह से जनपदीय पत्रकारों की आवाज तक गायब है। जनपद स्तर पर कोई ऐसा मजबूत प्लेटफार्म नहीं।
जनपद पत्रकार आज किसी अजनबी चिड़िया के नाम सरीखा रह गया है, जिसे पहचानने वाला कोई नहीं। ऐसे में अब समय आ गया है कि इस अस्सीवें स्वतंत्रता दिवस पर ही जनपदीय पत्रकारिता और जनपदीय पत्रकारों को औपचारिक रूप से बंद करने की घोषणा कर दी जाए, साथ ही पत्रकारिता के छोटे-बड़े तमाम कोर्स भी बंद करने पर गंभीरता से विचार होना चाहिए। इससे न जाने कितने युवाओं की जिंदगी संवर जाएगी, जो एक ऐसे भ्रम में उलझने से बच जाएंगे जिसका न कोई भविष्य है, न कोई सम्मान।
इससे बड़ा प्रमाण और क्या होगा कि आज़ादी के बाद से आज तक संसद हो, राज्यसभा हो, विधानसभा-विधान परिषद हो, या जिला पंचायत, ब्लॉक और ग्राम सभा जैसे मंच, कहीं भी जनपद पत्रकार की समस्याओं या उसके हक़ में एक सवाल तक नहीं उठा। उसकी आर्थिक सुरक्षा के लिए कभी कोई बजटीय प्रावधान तक नहीं किया गया। यह दुर्भाग्य ही है कि लालकिले की प्राचीर से, जहां से देश के हर वर्ग का जिक्र होता है, वहां भी देश के जनपदीय पत्रकारों का नाम तक कभी नहीं लिया गया। स्वतंत्रता के अस्सी वर्षों बाद भी यह मौन ही सबसे बड़ा जवाब है।
एक पत्रकार की बतकही/INN
