मुरादाबाद। कभी विश्वविद्यालयों को ज्ञान, शोध, चिंतन और व्यक्तित्व निर्माण का केंद्र माना जाता था। यहां विद्यार्थियों को शिक्षा, संस्कार और समाज के प्रति जिम्मेदारी का बोध कराया जाता था। लेकिन बदलते दौर में कुछ निजी शिक्षण संस्थानों की प्राथमिकताएं बदलती दिखाई दे रही हैं। अब कई विश्वविद्यालयों में अकादमिक विमर्श और शोध संगोष्ठियों की जगह फिल्मी सितारों के कार्यक्रम सुर्खियां बटोर रहे हैं। इसी क्रम में हाल ही में मुरादाबाद के एक निजी विश्वविद्यालय में फिल्म अभिनेता अक्षय कुमार और अन्य कलाकारों की मौजूदगी को लेकर बहस छिड़ गई है।
फिल्म के प्रचार-प्रसार से जुड़े इस कार्यक्रम में अभिनेता हेलीकॉप्टर से पहुंचे और उन्हें देखने के लिए बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएं एकत्रित हुए। विश्वविद्यालय प्रशासन के शीर्ष पदाधिकारी स्वयं कलाकारों के स्वागत और कार्यक्रम के संचालन में सक्रिय दिखाई दिए। कार्यक्रम के बाद संस्थान की ओर से इसका व्यापक प्रचार-प्रसार भी किया गया।

शिक्षा से ज्यादा आकर्षण पर फोकस?
शिक्षा जगत से जुड़े कई लोगों का मानना है कि विश्वविद्यालयों का मूल उद्देश्य ज्ञान का सृजन और प्रसार है, न कि मनोरंजन उद्योग के प्रचार अभियानों का मंच बनना। उनका सवाल है कि यदि विश्वविद्यालयों में फिल्म प्रमोशन ही प्रमुख आकर्षण बन जाए तो शिक्षा और शोध की गंभीरता पर क्या प्रभाव पड़ेगा?
आलोचकों का कहना है कि विद्यार्थियों के सामने आदर्श के रूप में वैज्ञानिकों, शिक्षाविदों, साहित्यकारों, प्रशासनिक अधिकारियों और नवाचार करने वाले युवाओं को प्रस्तुत किया जाना चाहिए, ताकि वे उनसे प्रेरणा लेकर अपने भविष्य का निर्माण कर सकें।
क्या यही है नई शिक्षा संस्कृति?
जानकारों का तर्क है कि विश्वविद्यालयों में राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर के शिक्षाविदों की व्याख्यानमाला, शोध कार्यशालाएं, नवाचार सम्मेलन और करियर उन्मुख कार्यक्रम अधिक उपयोगी साबित हो सकते हैं। इसके विपरीत फिल्मी हस्तियों के प्रचारात्मक कार्यक्रम शिक्षा के वातावरण को मनोरंजन-केंद्रित बनाने का जोखिम पैदा करते हैं।
उनका कहना है कि जब किसी विश्वविद्यालय की सबसे बड़ी उपलब्धि किसी अभिनेता का आगमन बन जाए और उसी को प्रमुखता से प्रचारित किया जाए, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि संस्थान अपनी अकादमिक पहचान को कितना महत्व दे रहा है।

छवि निर्माण या शिक्षा का व्यवसायीकरण?
आलोचकों का एक वर्ग इसे निजी विश्वविद्यालयों की ब्रांडिंग रणनीति का हिस्सा मानता है। उनका कहना है कि ऐसे आयोजनों का उद्देश्य शिक्षा की गुणवत्ता प्रदर्शित करना कम और संस्थान का प्रचार करना अधिक दिखाई देता है। इससे विश्वविद्यालयों को अल्पकालिक चर्चा तो मिल सकती है, लेकिन दीर्घकाल में उनकी पहचान शोध, नवाचार और शैक्षणिक उत्कृष्टता से ही बनती है।
समाज में उठ रहे सवाल
शिक्षा क्षेत्र से जुड़े लोगों का कहना है कि विश्वविद्यालयों को यह तय करना होगा कि वे विद्यार्थियों के लिए ज्ञान के केंद्र बनना चाहते हैं या फिर फिल्मी आयोजनों और सेलिब्रिटी संस्कृति के प्रदर्शन स्थल। उनका मानना है कि शिक्षा संस्थानों की गरिमा तब बढ़ती है जब वहां विचारों का आदान-प्रदान हो, शोध को बढ़ावा मिले और विद्यार्थियों को बौद्धिक रूप से समृद्ध करने वाले कार्यक्रम आयोजित किए जाएं।
फिलहाल, इस तरह के आयोजनों को लेकर मुरादाबाद में चर्चा तेज है। सवाल यही है कि क्या विश्वविद्यालयों का भविष्य अकादमिक उत्कृष्टता से तय होगा या फिर फिल्मी चमक-दमक से?
