अमरोहा। देश के प्रबुद्ध नागरिकों ने राष्ट्रपति, प्रदेशों के राज्यपालों और मानव संसाधन मंत्रालय से एक स्वर में नकारात्मक व हिंसक मानसिकता को बढ़ावा देने वाली फिल्मों के निर्माण और विशेष रूप से विश्वविद्यालयों व शिक्षण संस्थानों में फिल्मों के प्रमोशन पर पूर्णतः पाबंदी लगाई जाने की मांग करते हुए कहा कि युवा पीढ़ी के मानस को कलुषित होने से बचाया जा सके।
शिक्षाविद एवं लेखक डॉ यतींद्र विद्यालंकार ने कहा है कि आज का समाज जिस तथाकथित आधुनिकता और चकाचौंध की ओर बढ़ रहा है, वह भीतर से कितनी खोखली और हिंसक हो चुकी है, इसका प्रमाण हाल ही में पुणे के लोहागढ़ किले में देखने को मिला। जहाँ एक ओर सिनेमाई पर्दे पर अमीर-गरीब के भेद को मिटाकर प्रेम की जीत के खोखले आदर्श गढ़े जाते हैं, वहीं हकीकत के धरातल पर उसी कथित प्रेम, वासना और निजी स्वार्थ के लिए अपनों को ही मौत के घाट उतारने की घिनौनी साजिशें रची जा रही हैं। पुणे में एक मंगेतर द्वारा अपने प्रेमी के साथ मिलकर अपने ही मंगेतर, 26 वर्षीय व्यवसायी केतन अग्रवाल, को 350 फुट गहरी खाई में धक्का देकर मार डालने की घटना मात्र एक अपराध नहीं, बल्कि हमारे सामाजिक और नैतिक ढांचे के पूरी तरह ढह जाने का संकेत है।

डॉ विद्यालंकार ने आगे कहा कि माता-पिता द्वारा दशकों तक लाड़-प्यार और संस्कारों से पाले गए बच्चों का पल भर में ऐसा क्रूरतम रूप ले लेना समूचे प्रबुद्ध वर्ग, नागरिक समाज और चिंतकों को झकझोर कर रख देता है कि आखिर अब किस पर विश्वास किया जाए?

शिक्षाविद विनोद रिछारिया ने कहा कि इस प्रकार की हृदयविदारक घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो इसके लिए हमें मिलकर तत्काल कुछ ठोस, परिणाम-उन्मुख और व्यावहारिक कदम उठाने होंगे। सबसे पहली और अनिवार्य आवश्यकता पारिवारिक स्तर पर संवादहीनता को समाप्त करने की है; माता-पिता को अपने बच्चों के साथ केवल भौतिक सुख-सुविधाओं का नहीं, बल्कि एक ऐसा आत्मीय और खुला रिश्ता बनाना होगा जहाँ बच्चे अपनी भावनाएं, असहमति और इच्छाएं बिना किसी डर के साझा कर सकें। जैसा कि पीड़ित पिता ने भी विलाप करते हुए कहा कि यदि विवाह से इंकार था तो एक बार मना कर दिया होता, रिश्ता खुशी-खुशी निरस्त कर दिया जाता। इसके साथ ही, हमारी शिक्षा व्यवस्था और सामाजिक ताने-बाने में नैतिक मूल्यों, धैर्य और सहिष्णुता के पाठ को पुनः प्राथमिक स्थान देना होगा, ताकि बच्चों को करियर और पैसे की अंधी दौड़ से इतर एक संवेदनशील इंसान बनाया जा सके।

इसी परिप्रेक्ष्य में, समाज में विकृति फैलाने वाले कारकों पर कड़ा प्रहार करने के लिए देश के प्रबुद्ध नागरिकों ने माननीय राष्ट्रपति, प्रदेशों के राज्यपालों और मानव संसाधन मंत्रालय से एक स्वर में यह पुरजोर मांग उठाई है कि ऐसी नकारात्मक व हिंसक मानसिकता को बढ़ावा देने वाली फिल्मों के निर्माण और विशेष रूप से विश्वविद्यालयों व शिक्षण संस्थानों में इनके प्रमोशन पर पूर्णतः पाबंदी लगाई जाए, ताकि युवा पीढ़ी के मानस को कलुषित होने से बचाया जा सके। जब तक हम समाज में भौतिकतावाद के ऊपर मानवीय संवेदनाओं, संस्कारों और ‘विश्वास’ की पुनः स्थापना नहीं करेंगे, तब तक प्रेम के भेष में छिपी ऐसी हिंसक हवस और आत्मघाती प्रवृत्तियों पर पूर्ण विराम लगाना असंभव होगा।
