अमरोहा। भारतीय लोकतंत्र में मीडिया की स्वतंत्रता का सफर अद्वितीय रहा है, जहां संसदीय अधिकारों की सुरक्षा से लेकर आपातकाल के दमन और आज की प्रशासनिक उपेक्षा तक इसके स्वरूप में कई बड़े बदलाव आए हैं। स्वतंत्र पत्रकारिता के प्रबल पक्षधर और पूर्व सांसद फिरोज गांधी ने देश में पहला निजी सदस्य विधेयक पेश कर प्रेस को संसदीय कार्यवाही की निर्भीक और सत्यनिष्ठ रिपोर्टिंग करने का ऐतिहासिक कानूनी अधिकार दिलाया था। यह वैधानिक सुरक्षा कवच लोकतंत्र को मजबूत करने की दिशा में मील का पत्थर साबित हुआ, जिसने जनता को नीति-निर्धारण की पारदर्शी जानकारी दी।
परंतु, लोकतंत्र की इस गौरवशाली यात्रा को 25 जून 1975 के आपातकाल ने एक गहरे अंधकार में धकेल दिया, जब नागरिकों के मौलिक अधिकार छीनकर प्रेस पर सख्त सरकारी सेंसरशिप लागू कर दी गई। सच लिखने वाले साहसी पत्रकारों को बिना मुकदमे जेल में डाल दिया गया, जिसके विरोध में प्रखर अखबारों ने अपने संपादकीय पृष्ठ खाली छोड़ दिए थे। वह काला दौर आज भी अभिव्यक्ति की आजादी की रक्षा करने की सबसे बड़ी सीख देता है।
यदि वर्तमान परिदृश्य की तुलना की जाए, तो आज जिला स्तरीय पत्रकारिता एक मूक प्रशासनिक संकट से जूझ रही है।
उत्तर प्रदेश के अमरोहा सहित विभिन्न जनपदों में जिला मान्यता प्राप्त पत्रकारों के रेल किराए में छूट की सुविधा समाप्त कर दी गई है। इसके अलावा, जनपदों में स्थाई समिति की नियमित बैठकों में अधिकारियों की आना-कानी, आर्थिक व सामाजिक सुरक्षा का अभाव, पेंशन, कैशलेस इलाज की अनुपलब्धता और पत्रकारों द्वारा उठाई जाने वाली जनहित की खबरों पर सरकार व अधिकारियों द्वारा संज्ञान न लेना गंभीर चिंता का विषय बन चुका है। इतिहास गवाह है कि आपातकाल ने जहां सीधे प्रहार से आवाज दबाई थी, वहीं आज की व्यवस्था बुनियादी सुविधाओं की कटौती और भारतीय प्रेस परिषद की उदासीनता से लोकतंत्र के इस चौथे स्तंभ को दिन-ब-दिन बढ़ती दुश्वारियों से जूझना पड़ रहा है।
लेखक : महिपाल सिंह, जिला अध्यक्ष, उत्तर प्रदेश मान्यता प्राप्त पत्रकार समिति, अमरोहा
