मुरादाबाद/अमरोहा। एक मान्यता प्राप्त और करीब पैंतीस से चालीस वर्षों तक जमीनी स्तर पर सक्रिय रहने वाले वरिष्ठ पत्रकार डॉ. मुस्तकीम के निधन को कई महीने बीत जाने के बाद भी, मीडिया जगत और प्रशासनिक तंत्र में उपजी उदासीनता पर आत्ममंथन का दौर जारी है। उनके अवसान के समय मुरादाबाद और अमरोहा के सूचना एवं जनसंपर्क कार्यालयों द्वारा औपचारिक शोक संवेदना तक व्यक्त न किया जाना और मुख्यधारा के प्रमुख समाचार पत्रों में इस दुखद समाचार को सिंगल कॉलम से अधिक स्थान न मिलना, वर्तमान मीडिया व्यवस्था की एक ऐसी गंभीर नीतिगत विडंबना को प्रदर्शित करता है जो आज भी उतनी ही प्रासंगिक है।
यह अनुत्तरित प्रश्न आज संपूर्ण पत्रकारिता जगत के सामने मजबूती से खड़ा है कि किसी प्रख्यात संपादक या प्रबंधन के शीर्ष चेहरे के अतिरिक्त, समाज और तंत्र के लिए अपना संपूर्ण जीवन खपा देने वाले एक आम व कर्मठ पत्रकार के अवसान की खबर को समाचार पत्रों में अत्यंत सीमित महत्व मिलने की यह परिपाटी कैसे और किसके स्तर पर स्थापित हुई।
यह ढांचा किसी प्रबंधन के आंतरिक निर्देशों का परिणाम है, संपादकीय बोर्ड के संकुचन का हिस्सा है या फिर समाचार कक्षों में बैठे पेजीनेटरों और उप-संपादकों की तात्कालिक सुविधानुसार तय की गई एक यांत्रिक प्रक्रिया है, इस पर आज भी गहरे विश्लेषण और सुधारात्मक दृष्टिकोण की आवश्यकता महसूस की जा रही है।
तीन दशकों से अधिक समय तक धरातल पर संघर्ष करने वाले जमीनी स्तंभ के अवसान पर ‘सिंगल कॉलम’ की विडंबना ने पत्रकारिता जगत की आंतरिक कड़वी सच्चाई और प्रशासनिक उदासीनता को किया उजागर
इस समसामयिक परिदृश्य में यह कड़वी सच्चाई भी निरंतर रेखांकित होती है कि गोरखपुर जैसे कुछ गिने-चुने जनपदों में मान्यता प्राप्त पत्रकारों के निधन पर शासकीय स्तर से शोक-संवेदना व्यक्त करने के आजमगढ़ में दिवंगत मान्यता प्राप्त पत्रकार राजीव चौहान जैसे अपवाद स्वरूप उदाहरणों को छोड़ दिया जाए, तो मुरादाबाद और अमरोहा जैसे महत्वपूर्ण जिलों के सूचना एवं जनसंपर्क विभाग, जिला सूचना अधिकारी और स्थानीय प्रशासनिक तंत्र पत्रकारों के अवसान पर उस गरिमा और सम्मान का निर्वहन नहीं करते हैं, जिसके वे वास्तव में हकदार हैं।
विडंबना यह है कि मुरादाबाद के सूचना एवं जनसंपर्क विभाग की बेहतरी के हक में कलेक्ट्रेट परिसर में भवन आदि दिलवाने में महत्वपूर्ण योगदान देने वाले डॉ. मुस्तकीम जैसी शख्सियतों के बावजूद, प्रशासनिक तंत्र गाहे-बगाहे सरकारी योजनाओं, विज्ञप्तियों और प्रशासनिक खबरों के व्यापक प्रचार-प्रसार व समयबद्ध प्रकाशन के लिए इन्हीं मीडिया बंधुओं को सदैव तत्पर रखने की अपेक्षा रखता है, परंतु जब बात एक पत्रकार के जीवन की अंतिम विदा की आती है, तो पूरी व्यवस्था संवेदनशून्य नजर आती है।
एक सजग पत्रकार अपना संपूर्ण जीवन समाज के सजग प्रहरी के रूप में जीता है और जनहित के मुद्दों को स्वर देता है। राजनीतिक वर्ग की तरह ही समाज के बीच सक्रिय रहते हुए जहां कुछ उंगलियों पर गिने जाने वाले पत्रकार व्यवस्था के साथ साठगांठ कर अपने लिए एक सुरक्षित, संपन्न और बेहतर जीवन का मार्ग तलाश लेते हैं, वहीं बहुसंख्यक ग्रामीण व जिला स्तरीय पत्रकारों के हिस्से में जीवन भर केवल अनवरत संघर्ष, उपेक्षा और अभाव ही आते हैं।
दूसरों के सुख-दुख और जनसमस्याओं की निरंतर खबर लेने वाला यह पत्रकार खुद अपने जीवन के अंतिम पड़ाव पर भी अपने संस्थान और व्यावसायिक समाज के लिए एक गरिमापूर्ण खबर नहीं बन पाता है, जो कि मौजूदा मीडिया संस्कृति के तेजी से बदलते व्यावसायिक और संवेदनहीन नजरिए की ओर साफ इशारा करता है।
हालांकि, संवेदनशीलता के पूरी तरह समाप्त होने के इस दौर में भी डॉ. संतोष गुप्ता और राकेश कुमार के साथ कुछ स्थानीय और क्षेत्रीय समाचार पत्रों की भूमिका अत्यंत सराहनीय रही है। डॉ. मुस्तकीम साहब के निधन के बाद जहां कॉर्पोरेट और प्रमुख अखबारों ने उनके योगदान को नगण्य स्थान दिया, वहीं मुरादाबाद, बिजनौर और अमरोहा से प्रकाशित कुछ जुझारू संस्थानों ने उनके पैंतीस-चालीस वर्षों के दीर्घकालिक योगदान का संज्ञान लेते हुए समाचारों में सम्मानजनक, व्यापक और उचित स्थान प्रदान किया, जो पत्रकारिता की मूल संवेदना और आंतरिक एकजुटता को जीवित रखने का एक जीवंत प्रमाण है।
यदि किसी प्रतिष्ठित न्यूज़ एजेंसी या समाचार पत्र के लिए उसके अपने ही एक पुराने, वफादार और कर्मठ साथी का अवसान लगभग महत्वहीन और उपेक्षित श्रेणी में चला जाएगा, तो सामान्य समाज या बाहरी तंत्र से पत्रकारों को उचित तवज्जो और सम्मान मिलने की उम्मीद करना पूरी तरह बेमानी होगा। समाचार पत्रों के स्वामियों, प्रबंधकों, मुख्य संपादकों और जागरूक पत्रकार संगठनों को इस गिरते स्तर और आंतरिक मूल्यांकन की व्यवस्था पर अनिवार्य रूप से पुनरावलोकन करना होगा, ताकि कलम के सिपाहियों को उनके जीवन काल में और अवसान के पश्चात वह न्यूनतम सम्मान मिल सके जिसके वे वास्तविक अधिकारी हैं।
समाज और पत्रकारिता के प्रति अपनी जीवनपर्यंत अमिट सेवाओं के लिए सदैव याद किए जाने वाले दिवंगत डॉ. मुस्तकीम साहब को संपूर्ण मीडिया जगत की ओर से आज भी उतनी ही विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित है।
