मुरादाबाद/विशेष।
लखनऊ में एक कोचिंग सेंटर में भीषण आग लगने से 15 बच्चों की दर्दनाक मौत के बाद उत्तर प्रदेश सरकार पूरे प्रदेश में बिना मानकों और आवश्यक विभागीय एनओसी के संचालित अवैध कोचिंग सेंटरों पर लगातार कार्रवाई कर रही है। बड़ी संख्या में संस्थानों को सील किया जा चुका है। प्रशासन का कहना है कि ऐसे संस्थान छात्रों की सुरक्षा के साथ खिलवाड़ कर रहे थे।
कार्रवाई के बाद अब बड़ी संख्या में अभिभावक अपने बच्चों की पढ़ाई, जमा की गई फीस और भविष्य को लेकर चिंता जता रहे हैं। उनका कहना है कि सरकार और प्रशासन को कार्रवाई से पहले या उसके साथ-साथ प्रभावित छात्रों के लिए वैकल्पिक व्यवस्था भी करनी चाहिए थी, ताकि उनकी पढ़ाई बाधित न हो।
लेकिन इस पूरे मामले का एक दूसरा पक्ष भी है, जिस पर शायद सबसे कम चर्चा हो रही है। सवाल यह है कि जिन छात्रों को स्कूल के समय अपनी-अपनी कक्षाओं में होना चाहिए था, वे उसी समय इन कोचिंग सेंटरों में कैसे पढ़ रहे थे? यदि छात्र कोचिंग में थे तो स्कूलों में उनकी उपस्थिति कैसे दर्ज हो रही थी? क्या अभिभावकों को इस व्यवस्था की जानकारी नहीं थी?
हकीकत यह है कि वर्षों से स्कूल के समय कोचिंग चलाने और बच्चों को वहां भेजने की प्रवृत्ति एक खुले रहस्य की तरह रही है। मोटी फीस देकर कई अभिभावक स्वयं अपने बच्चों को नियमित स्कूल की पढ़ाई छोड़कर कोचिंग पर अधिक निर्भर बना रहे थे। ऐसे में केवल कोचिंग संचालकों पर सवाल उठाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उन अभिभावकों की जिम्मेदारी भी तय होनी चाहिए जिन्होंने यह जानते हुए भी बच्चों को नियमों के विपरीत ऐसे संस्थानों में भेजा।
सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि यदि ये संस्थान अग्नि सुरक्षा, भवन सुरक्षा और अन्य अनिवार्य मानकों के बिना संचालित हो रहे थे, तो क्या अभिभावकों ने कभी यह जानने की कोशिश की कि जिस इमारत में उनका बच्चा रोज कई घंटे बिताता है, वहां आग लगने या किसी अन्य हादसे की स्थिति में बचाव के क्या इंतजाम हैं?
लखनऊ की त्रासदी ने यह स्पष्ट कर दिया कि ऐसे अवैध कोचिंग सेंटर केवल नियमों का उल्लंघन नहीं कर रहे थे, बल्कि वे बच्चों की जान के लिए संभावित ‘जिंदा तंदूर’ बने हुए थे। ऐसे में आज यदि किसी को अपने बच्चे के भविष्य और जमा फीस की चिंता है, तो यह भी स्वीकार करना होगा कि सुरक्षा को नजरअंदाज कर केवल परिणाम और रैंक की दौड़ में शामिल होना भी इस संकट का एक बड़ा कारण बना।
सरकार की कार्रवाई पर सवाल उठाना हर नागरिक का अधिकार है, लेकिन उतना ही जरूरी यह सवाल भी है कि क्या हम अपने बच्चों की सुरक्षा से अधिक अंक और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी को महत्व देते रहे? यदि इसका जवाब ‘हां’ है, तो इस पूरे तंत्र की जिम्मेदारी केवल प्रशासन या कोचिंग संचालकों की नहीं, बल्कि समाज और अभिभावकों की भी बनती है@शांतनु/INN
