प्रयागराज/मुरादाबाद। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कोविड-19 महामारी के दौरान ड्यूटी करते हुए संक्रमित होकर जान गंवाने वाले मुरादाबाद के एक उपनिरीक्षक की पत्नी को बड़ी राहत प्रदान की है। न्यायालय ने मुरादाबाद के तत्कालीन जिलाधिकारी द्वारा अनुग्रह राशि का दावा खारिज किए जाने के आदेश को निरस्त करते हुए मामले पर नए सिरे से विचार करने के निर्देश दिए हैं।
मामला थाना सिविल लाइंस, मुरादाबाद में तैनात रहे उपनिरीक्षक योगेंद्र प्रताप द्विवेदी से जुड़ा है। उनकी पत्नी उषा द्विवेदी ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर बताया कि उनके पति कोरोना हेल्प डेस्क पर ड्यूटी के दौरान कोविड-19 से संक्रमित हो गए थे। संक्रमित पाए जाने के बाद उन्हें मुरादाबाद जिला अस्पताल के एल-2 एमसीएच विंग में भर्ती कराया गया, जहां 23 अप्रैल 2021 को उपचार के दौरान उनका निधन हो गया।
50 लाख रुपये की अनुग्रह राशि का दावा हुआ था खारिज
मृतक उपनिरीक्षक की पत्नी ने राज्य सरकार की कोविड ड्यूटी के दौरान मृत कार्मिकों के लिए लागू योजना के तहत 50 लाख रुपये की अनुग्रह राशि देने का आवेदन किया था। हालांकि, तत्कालीन जिलाधिकारी ने 11 नवंबर 2021 को यह कहते हुए आवेदन निरस्त कर दिया कि अभिलेखों में ऐसा कोई सक्षम आदेश उपलब्ध नहीं है, जिससे यह प्रमाणित हो सके कि मृतक की कोविड प्रबंधन संबंधी ड्यूटी विधिवत लगाई गई थी।
राज्य सरकार ने रखा यह पक्ष
मामले की सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से तर्क दिया गया कि कई अवसर दिए जाने के बावजूद मृतक की कोविड ड्यूटी से संबंधित आवश्यक दस्तावेज प्रस्तुत नहीं किए गए। इसलिए केवल संक्रमण और मृत्यु के आधार पर अनुग्रह राशि का लाभ नहीं दिया जा सकता।
हाईकोर्ट ने प्रमाणपत्रों को माना महत्वपूर्ण
न्यायमूर्ति प्रकाश पाडिया और न्यायमूर्ति विवेक सरन की खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान पाया कि याचिका के साथ वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक, मुरादाबाद द्वारा जारी प्रमाणपत्र संलग्न है, जिसमें स्पष्ट रूप से उल्लेख है कि मृतक उपनिरीक्षक की कोविड ड्यूटी लगाई गई थी।
अदालत ने यह भी माना कि एक अन्य ड्यूटी प्रमाणपत्र भी अभिलेख पर उपलब्ध है, जो शासनादेश के प्रारूप के अनुरूप है और उसमें कोविड ड्यूटी की अवधि का उल्लेख किया गया है। ऐसे में केवल तकनीकी आधार पर याचिकाकर्ता का दावा खारिज करना उचित नहीं माना जा सकता।
कल्याणकारी योजना का उद्देश्य नहीं हो सकता विफल
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि अनुग्रह राशि से संबंधित शासनादेश एक कल्याणकारी योजना है। यदि विभागाध्यक्ष अथवा वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक द्वारा जारी प्रमाणपत्र उपलब्ध है, तो उसके आधार पर दावे पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए। न्यायालय ने कहा कि तकनीकी कमियों के आधार पर वास्तविक पात्र व्यक्ति को लाभ से वंचित नहीं किया जा सकता।
डीएम का आदेश निरस्त, तीन महीने में नया निर्णय
खंडपीठ ने 11 नवंबर 2021 को पारित जिलाधिकारी के आदेश को रद्द करते हुए निर्देश दिया कि मुरादाबाद के जिलाधिकारी वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक कार्यालय से आवश्यक अभिलेख और ताजा टिप्पणी प्राप्त करें तथा आदेश की प्रमाणित प्रति मिलने की तिथि से तीन माह के भीतर याचिकाकर्ता के दावे पर पुनः विचार कर विधि के अनुसार निर्णय लें।
अदालत ने याचिका स्वीकार करते हुए मामले का निस्तारण कर दिया। फिलहाल किसी पक्ष पर लागत (हर्जाना) नहीं लगाई गई@जफर/INN
