मेरठ/अमरोहा, 23 अगस्त ।पश्चिमी उत्तर प्रदेश में किसान हितों की आवाज उठाने वाले भारतीय किसान यूनियन (बीआर अंबेडकर) के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. दिग्विजय सिंह भाटी और उनके साथी मोहित जाटव के साथ मेरठ में पुलिस हिरासत के दौरान कथित मारपीट व अमानवीय प्रताड़ना का मामला अब प्रशासनिक व कानूनी विवाद का रूप ले चुका है। डॉ. भाटी के समर्थकों और संयुक्त गुर्जर परिसंघ ने अमरोहा से मेरठ तक पुलिस कार्रवाई के सिलसिले को जोड़ते हुए स्वतंत्र न्यायिक जांच की मांग उठाई है।
मुख्य प्रश्न यह उभरा है कि किसान नेता पर दर्ज मुकदमों, गुंडा एक्ट और जिला बदर की कार्रवाई से लेकर मेरठ की कथित घटना तक की कड़ियां आपस में जुड़ी हैं या अलग-अलग हैं, जिसका उत्तर निष्पक्ष जांच से ही संभव है।

19 अगस्त को मेरठ में हुई घटना को लेकर डॉ. भाटी ने तत्कालीन एसएसपी अविनाश पांडेय और पुलिसकर्मियों पर गंभीर मारपीट तथा थर्ड डिग्री प्रताड़ना के आरोप लगाए हैं। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार उन्होंने एसएसपी और एसओजी कार्यालय में प्रताड़ित किए जाने का दावा किया है, वहीं दूसरी ओर पुलिस ने इन आरोपों का खंडन करते हुए चोटों को स्कूटी दुर्घटना का परिणाम बताया है। इसी विरोधाभास ने मामले की निष्पक्ष जांच की आवश्यकता को और रेखांकित कर दिया है।
डॉ. दिग्विजय भाटी के विरुद्ध अमरोहा में हुई पूर्व पुलिस कार्रवाइयां भी इस समय चर्चा में हैं। अमरोहा पुलिस ने डॉ. भाटी पर गुंडा एक्ट की कार्रवाई की थी, जिसे भाटी पक्ष ने किसान की आवाज को दबाने का प्रयास बताया, जबकि पुलिस ने इसका आधार पुराने आपराधिक मामलों को बनाया था। इसके अतिरिक्त हसनपुर सर्किल पुलिस द्वारा की गई जिला बदर की कार्रवाई और गांव में मुनादी कराने के दावों की वैधानिक प्रक्रिया की समीक्षा भी अब जांच का विषय मानी जा रही है।
मेरठ में ललिता गौतम हत्याकांड को लेकर हुए विरोध प्रदर्शन के बाद उत्पन्न विवाद इस पूरे प्रकरण की एक और कड़ी है। भाटी पक्ष का दावा है कि जिस प्रदर्शन को लेकर पुलिस ने कार्रवाई की, उसमें डॉ. भाटी की उपस्थिति ही नहीं थी, फिर भी उनका नाम पुलिस ब्रीफिंग में प्रमुखता से शामिल किया गया। इस दावे की सत्यता पुलिस रिकॉर्ड, वीडियो फुटेज, कॉल डिटेल और आधिकारिक रिपोर्टों के तकनीकी परीक्षण से ही स्पष्ट हो सकती है।
प्रेस कॉन्फ्रेंस में भाटी को अन्य जिले से जिला बदर और हिस्ट्रीशीटर के रूप में पेश करने पर भी कानूनी सवाल खड़े किए गए हैं। विधिक सिद्धांत के अनुसार किसी व्यक्ति के खिलाफ विचाराधीन मामले या पुराना रिकॉर्ड वर्तमान घटना के आरोपों का सीधा प्रमाण नहीं हो सकता। न्यायालय द्वारा दोष सिद्ध होने और केवल मुकदमे दर्ज होने में स्पष्ट अंतर होता है, इसलिए 19 अगस्त की घटना की जांच को पुराने मामलों के प्रभाव से मुक्त रखना आवश्यक माना जा रहा है।
इसी पृष्ठभूमि में अमरोहा के आदमपुर थाना क्षेत्र के एक पुराने मामले का संदर्भ भी सामने लाया जा रहा है, जहां एक किशोरी की हत्या के आरोप में उसके परिजनों को जेल भेजा गया था, किंतु बाद में किशोरी के जीवित मिलने पर अदालत के आदेश पर तत्कालीन प्रभारी निरीक्षक समेत ग्यारह पुलिसकर्मियों के विरुद्ध मुकदमा दर्ज हुआ था। इसी संदर्भ को आधार बनाकर डॉ भाटी समर्थक हसनपुर सर्किल में किसान नेता के विरुद्ध हुई निरोधात्मक कार्रवाइयों की निष्पक्ष समीक्षा की मांग कर रहे हैं।
संयुक्त गुर्जर परिसंघ की बैठक में विभागीय जांच की निष्पक्षता पर सवाल उठाते हुए न्यायिक मजिस्ट्रेट से जांच कराए जाने की मांग की गई। परिसंघ ने मेरठ एसएसपी व एसओजी कार्यालय के सीसीटीवी फुटेज, ड्यूटी रजिस्टर, मेडिकल रिपोर्ट और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों को सुरक्षित रखे जाने की बात भी कही है।
मामले की गंभीरता को देखते हुए शासन स्तर पर तत्कालीन एसएसपी अविनाश पांडेय को मेरठ से हटाकर मुख्यालय से संबद्ध कर दिया गया है और जांच प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। हालांकि जवाबदेही तय करने के लिए 19 अगस्त के घटनाक्रम की स्पष्ट रिपोर्ट की प्रतीक्षा अभी बनी हुई है। यह प्रकरण नागरिक अधिकारों, पुलिस की शक्तियों और प्रशासनिक पारदर्शिता के बीच संतुलन का एक महत्वपूर्ण बिंदु बनकर उभरा है@शांतनु/INN
