जी ग्रुप के संस्थापक सुभाष चंद्रा को बड़ी कानूनी राहत मिली है। नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) ने उनके पर्सनल इंसॉल्वेंसी मामले में ₹22,006.57 करोड़ के दावों के मुकाबले सिर्फ ₹6.5 करोड़ के भुगतान वाले रीपेमेंट प्लान को मंजूरी दे दी है। इसका सीधा असर उन बैंकों और वित्तीय संस्थानों पर पड़ेगा, जिन्होंने सुभाष चंद्रा की व्यक्तिगत गारंटी के आधार पर कर्ज दिया था।
₹22 हजार करोड़ के मुकाबले सिर्फ ₹6.5 करोड़
NCLT के फैसले के मुताबिक, सुभाष चंद्रा को कुल ₹22,006.57 करोड़ के क्लेम के बदले ₹6.5 करोड़ का भुगतान करना होगा। यानी व्यक्तिगत गारंटी से जुड़े दावों पर करीब 99.97 फीसदी का हेयरकट होगा। प्लान लागू होने के बाद इस व्यक्तिगत देनदारी की बाकी रकम की वसूली नहीं की जा सकेगी।
मामला शुरू कैसे हुआ?
इस विवाद की शुरुआत 2016 में हुई, जब इंडियाबुल्स हाउसिंग फाइनेंस ने कुछ कंपनियों को करीब ₹726 करोड़ का कर्ज दिया था। वर्ष 2018 में सुभाष चंद्रा इन कंपनियों के पर्सनल गारंटर बने।
कंपनियों के डिफॉल्ट करने के बाद उनकी व्यक्तिगत गारंटी के आधार पर चंद्रा के खिलाफ कार्रवाई शुरू हुई। इंडियाबुल्स ने 2022 में कानूनी प्रक्रिया शुरू की और 2024 में मामला NCLT तक पहुंचा।
बाद में एस्सेल ग्रुप की दूसरी कंपनियों से जुड़े कर्जों में भी सुभाष चंद्रा की व्यक्तिगत गारंटी सामने आई। HDFC, एक्सिस बैंक, कैनरा बैंक और RBL बैंक समेत कई कर्जदाताओं के दावे इसमें शामिल होते गए। ब्याज और अन्य देनदारियों को मिलाकर कुल क्लेम बढ़कर ₹22,006.57 करोड़ पहुंच गया।
NCLT में आया था मतभेद
मामले की सुनवाई कर रही दो सदस्यीय NCLT बेंच में शुरुआत में एकमत फैसला नहीं आया। इसके बाद तीसरे सदस्य के रूप में ज्यूडिशियल मेंबर नीलेश शर्मा को शामिल किया गया। बहुमत के आधार पर 144 पन्नों के आदेश में रीपेमेंट प्लान को मंजूरी दी गई।
LIC हाउसिंग फाइनेंस समेत कुछ लेनदारों ने जताई आपत्ति
रीपेमेंट प्लान का कुछ कर्जदाताओं ने विरोध किया था। LIC हाउसिंग फाइनेंस ने इसे अव्यावहारिक और गैर-कानूनी बताते हुए आपत्ति दर्ज कराई थी। कंपनी का दावा था कि उसके करीब ₹1,322.39 करोड़ के बकाये के मुकाबले उसे केवल ₹38.09 लाख मिलने हैं।
हालांकि, NCLT ने इन आपत्तियों को स्वीकार नहीं किया। ट्रिब्यूनल के सामने प्लान को 80.81 फीसदी वोटिंग शेयर वाले लेनदारों का समर्थन हासिल था, जबकि विरोध करने वाले लेनदारों की हिस्सेदारी 20 फीसदी से कम थी।
चंद्रा की मौजूदा नेटवर्थ कितनी है?
उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक सुभाष चंद्रा की संपत्ति में पिछले कुछ वर्षों में भारी गिरावट आई है।
- 2017: करीब ₹45,888 करोड़ — RBL बैंक के आंकड़ों के मुताबिक
- 2018: करीब ₹40,562 करोड़ — कैनरा बैंक के आंकड़ों के मुताबिक
- मौजूदा नेटवर्थ: करीब ₹31.79 करोड़
NCLT के सामने यह भी तर्क रखा गया कि उनकी व्यक्तिगत संपत्ति का मूल्य प्रस्तावित भुगतान से बहुत अधिक नहीं है। ट्रिब्यूनल ने माना कि प्लान खारिज होने पर चंद्रा के दिवालिया होने की स्थिति में लेनदारों को इससे भी कम रकम मिलने की संभावना थी।
क्या बैंकों के पूरे ₹22 हजार करोड़ डूब गए?
यह समझना जरूरी है कि 99.97 फीसदी हेयरकट सुभाष चंद्रा की पर्सनल गारंटी से जुड़े क्लेम पर लागू है। इसका मतलब यह नहीं है कि मूल कंपनियों का पूरा कर्ज खत्म हो गया है।
बैंकों और अन्य कर्जदाताओं के पास मूल कर्जदार कंपनियों, उनकी संपत्तियों और उपलब्ध सिक्योरिटी से वसूली के अधिकार बने रहेंगे।
अब आगे क्या होगा?
NCLT की मंजूरी के बाद रिजॉल्यूशन प्रोफेशनल लेनदारों की अंतिम सूची तैयार करेगा। इसके बाद ₹6.5 करोड़ की राशि नियमों के अनुसार संबंधित कर्जदाताओं में बांटी जाएगी। आवश्यक औपचारिकताएं पूरी होने के बाद मामला इंसॉल्वेंसी प्रक्रिया के अगले चरण में जाएगा।
बैंकिंग सेक्टर के लिए क्यों अहम है फैसला?
यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें व्यक्तिगत गारंटी, कॉरपोरेट कर्ज और इंसॉल्वेंसी कानून के बीच संबंध सामने आता है। NCLT के फैसले से यह भी स्पष्ट होता है कि निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के तहत पर्याप्त बहुमत से मंजूर रीपेमेंट प्लान को ट्रिब्यूनल स्वीकार कर सकता है, भले ही कुछ कर्जदाता उसका विरोध कर रहे हों।
