अमरोहा(महिपाल सिंह)। हिंदी सिनेमा के आज ग्लोबल होने और भाषाई सीमाएं टूटने से चार दशक पहले, बेहद सीमित संसाधनों में बनी एक हरियाणवी फिल्म ने बॉक्स ऑफिस के सारे समीकरण बदल दिए थे। 29 फरवरी 1984 को रिलीज हुई ‘चंद्रावल’ ने न केवल पौने दो करोड़ रुपये का ऐतिहासिक कारोबार किया, बल्कि इसके लोक संगीत का जादू देश के आम जनमानस से लेकर दिल्ली के लुटियंस जोन और सत्ता के गलियारों तक सिर चढ़कर बोला।
पूर्व केंद्रीय गृह राज्यमंत्री और देश के सर्वाधिक लोकप्रिय व मीडिया फ्रेंडली नेताओं में शुमार दिवंगत राजेश पायलट भी इस फिल्म और इसके संगीत के बड़े मुरीद थे। जब वे 3 अकबर रोड स्थित अपने सरकारी आवास में रहते थे, तो अक्सर उनके स्नानघर से ‘चंद्रावल’ के मशहूर गीत गुनगुनाने की आवाजें गूंजती थीं। गाड़िया लोहार समुदाय की युवती चंद्रावल और जाट युवक सूरज की इस दुखद प्रेमकथा ने यह साबित कर दिया था कि लोकधुन, मिट्टी की खुशबू और सशक्त कहानी के आगे भाषा की कोई दीवार नहीं होती।
निर्मात्री उषा शर्मा और निर्देशक जयंत प्रभाकर की इस ऐतिहासिक फिल्म का बजट महज पांच लाख रुपये था, जिसने फरीदाबाद के गगन सिनेमा में रजत जयंती मनाई और सिर्फ एक ही सिनेमाघर से अपनी पूरी लागत निकाल ली। जे.पी. कौशिक के संगीत और दिलराज कौर, विजय मजूमदार व भाल सिंह की आवाजों से सजे ‘जीजा तू काला मैं गोरी घनी’ और ‘गाड़े आली गजबन छोरी’ जैसे गीतों ने गांवों की चौपालों से लेकर शहर के सिनेमाघरों तक धूम मचा दी थी। पश्चिमी उत्तर प्रदेश और हरियाणा के ग्रामीण इलाकों से महिलाएं ट्रैक्टर-ट्रॉलियों में बैठकर इस फिल्म को देखने पहुँचती थीं, और कई दर्शकों ने तो इसे 200 से अधिक बार देखा।
सीमित संसाधनों में प्राकृतिक रोशनी में फिल्माई गई इस फिल्म के ‘रूंडे-खुंडे’ जैसे हास्य किरदार भी घर-घर में लोकप्रिय हुए। वर्ष 2012 में इसका सीक्वल ‘चंद्रावल-2’ भी बना, लेकिन जो इतिहास 1984 की मूल फिल्म ने रचा, वह आज भी भारतीय क्षेत्रीय सिनेमा के इतिहास में एक अनूठी मिसाल के रूप में दर्ज है@महीपाल सिंह/INN
