नोबेल पुरस्कार की घोषणा ने दुनिया को एक बार फिर चमत्कार से रूबरू करा दिया. 2025 का नोबेल पुरस्कार फिजियोलॉजी या मेडिसिन (चिकित्सा) में अमेरिका की मैरी ई. ब्रंकॉ, अमेरिका के फ्रेड राम्सडेल और जापान के शिमोन सकागुची को दिया गया है. यह पुरस्कार उनकी ‘पेरिफेरल इम्यून टॉलरेंस’ (शरीर के बाहरी हिस्सों में इम्यून सिस्टम की सहनशीलता) से जुड़ी खोजों के लिए है.
यह खोज शरीर की रक्षा प्रणाली को समझने में क्रांति लाई है, जो ऑटोइम्यून बीमारियों जैसे रूमेटॉइड आर्थराइटिस, टाइप-1 डायबिटीज और ल्यूपस के इलाज का रास्ता खोलेगी. स्टॉकहोम के कारोलिंस्का इंस्टीट्यूट ने सोमवार को घोषणा की.
हमारा शरीर इम्यून सिस्टम (रोग प्रतिरोधक क्षमता) से हमेशा खतरे से लड़ता है – जैसे वायरस या बैक्टीरिया से. लेकिन कभी-कभी यह सिस्टम गलती से अपने ही अंगों पर हमला कर देता है, जिसे ऑटोइम्यून बीमारी कहते हैं. पुराने वैज्ञानिकों को लगता था कि इम्यून सेल्स (रोगाणु से लड़ने वाली कोशिकाएं) शरीर के अंदर ही ‘सहिष्णु’ (टॉलरेंट) बन जाती हैं, जिसे सेंट्रल इम्यून टॉलरेंस कहते हैं.
लेकिन विजेताओं ने दिखाया कि शरीर के बाहरी हिस्सों (पेरिफेरल) में भी एक खास तंत्र काम करता है, जो इम्यून सिस्टम को नियंत्रित रखता है. इससे शरीर के अंग सुरक्षित रहते हैं.
यह खोज 1990 के दशक से शुरू हुई. विजेताओं ने पाया कि ‘रेगुलेटरी टी सेल्स’ (Tregs) नामक कोशिकाएं इम्यून सिस्टम को ब्रेक लगाती हैं. अगर ये कोशिकाएं कमजोर हों, तो शरीर के अंगों पर हमला होता है. यह खोज कैंसर, ट्रांसप्लांट और एलर्जी के इलाज में भी मदद करेगी.
