मुरादाबाद / अमरोहा, 8 सितंबर। सत्ता से निकटतम संबंध और पारिवारिक नजदीकी को सार्वजनिक जवाबदेही के आड़े न आने देने वाले महान संसदीय योद्धा एवं पत्रकार हितैषी फिरोज जहांगीर गांधी की 66वीं पुण्यतिथि के अवसर पर पत्रकारों द्वारा उनकी निर्भीक विरासत को याद किया गया।
इस मौके पर जनप्रतिनिधियों को जन-जवाबदेही का आईना भी दिखाया गया। यूपी वर्किंग जर्नलिस्ट यूनियन के सचिव डॉ. संतोष गुप्ता एवं उत्तर प्रदेश मान्यता प्राप्त पत्रकार समिति के पदाधिकारी महिपाल सिंह ने उनकी निर्भीक पत्रकारिता और निष्पक्ष संसदीय परंपरा को नमन करते हुए कहा कि आज राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, राज्यपाल, लोकसभा अध्यक्ष, विधानसभा अध्यक्ष, मुख्यमंत्री तथा सभी सांसदों व विधायकों को फिरोज जहांगीर गांधी के सिद्धांतों से सबक लेने की जरूरत है।
उन्होंने कहा कि संभवतया योगी आदित्यनाथ पहले ऐसे मुख्यमंत्री हैं जिन्होंने मान्यता प्राप्त वरिष्ठ पत्रकारों को पेंशन दिए जाने की सार्वजनिक घोषणा की थी, लेकिन अफसोस जनक पहलू यह है कि इस घोषणा के बाद से आज तक राज्य में पेंशन लागू नहीं की गई। जबकि देश के अधिकांश राज्यों में पत्रकारों के लिए पेंशन योजना न केवल बहुत पहले से लागू है, बल्कि कई राज्यों तक ने तो पेंशन राशि में बढ़ोतरी भी कर दी है। ऐसे में उत्तर प्रदेश सरकार व जनप्रतिनिधियों का यह ढुलमुल रवैया बेहद निराशाजनक है।
डॉ. संतोष गुप्ता ने बताया कि फिरोज जहांगीर गांधी का संसद में दिया गया वक्तव्य आज भी पूरी तरह प्रासंगिक है, जिसमें उन्होंने स्पष्ट कहा था कि “पत्रकार कोई साधारण मजदूर नहीं होता, वह समाज के ज्वलंत मुद्दों को उठाकर सीधे जन-सरोकारों से जुड़ा होता है; इसलिए उनके जीवकोपार्जन और सम्मानजनक जीवन के लिए सरकार को आर्थिक सहयोग प्रदान करना चाहिए।”
12 सितंबर 1912 को बंबई में जन्मे फिरोज जहांगीर गांधी ने स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय भागीदारी के साथ-साथ ‘नेशनल हेराल्ड’ के माध्यम से पत्रकारिता को नई दिशा दी। लोकसभा सांसद के रूप में उन्होंने सार्वजनिक धन के पारदर्शी इस्तेमाल पर हमेशा तथ्यपरक सवाल उठाए। उनकी संसदीय निष्ठा का सबसे बड़ा उदाहरण 1957-58 का चर्चित मूंदड़ा एलआईसी घोटाला मामला था। तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू उनके ससुर थे, लेकिन फिरोज गांधी ने पारिवारिक निष्ठा को अपने संसदीय दायित्व के आड़े नहीं आने दिया। संसद में उनके द्वारा उठाए गए सवालों के बाद गठित एम.सी. छागला आयोग की जांच के परिणामस्वरूप तत्कालीन वित्त मंत्री टी.टी. कृष्णमाचारी को पद से इस्तीफा देना पड़ा था। यह घटना स्वतंत्र भारत में लोकतांत्रिक निगरानी और नैतिक जवाबदेही की ऐतिहासिक नज़ीर बनी।
इस तरह पत्रकारिता के क्षेत्र में भी उनका योगदान अविस्मरणीय है। उनके ही प्रयासों से 1956 में गैर-सरकारी विधेयक के रूप में ‘संसदीय कार्यवाही (प्रकाशन संरक्षण) अधिनियम, 1956’ अस्तित्व में आया, जिसने संसद की रिपोर्टिंग करने तथा पत्रकारों को कानूनी सुरक्षा कवच प्रदान किया।
पत्रकारों ने रेखांकित किया कि आज के दौर में, विशेषकर ग्रामीण और जिला स्तर पर कार्यरत पत्रकारों को सामाजिक सुरक्षा, पेंशन, स्वास्थ्य और सम्मानजनक कार्य परिस्थितियों जैसी गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। ऐसे समय में फिरोज जहांगीर गांधी की सोच यह विश्वास दिलाती है कि स्वतंत्र पत्रकारिता केवल समाचार देने का माध्यम नहीं, बल्कि सत्ता को जनता और लोकतंत्र के प्रति जवाबदेह बनाने की सशक्त व्यवस्था है।
8 सितंबर 1960 को मात्र 47 वर्ष की आयु में निधन होने के छह दशक से अधिक समय बाद भी उनकी पुण्यतिथि हमें यह स्मरण कराती है कि किसी भी जनप्रतिनिधि की सर्वोच्च निष्ठा किसी व्यक्ति, परिवार या सत्ता प्रतिष्ठान के प्रति नहीं, बल्कि देश के संविधान, जनता और अपने वादों के प्रति होनी चाहिए@MP SINGH/INN
