उत्तराखंड के हल्द्वानी स्थित बनभूलपुरा में रेलवे की जमीन पर कथित अतिक्रमण से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को लेकर पूरे इलाके में तनाव और हलचल बढ़ गई है। फैसले से पहले प्रशासन ने सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी है। संवेदनशील इलाकों में पुलिस बल तैनात करने के साथ ही ड्रोन और सीसीटीवी के जरिए निगरानी की जा रही है।
यह मामला करीब 30 हेक्टेयर यानी लगभग 78 एकड़ जमीन से जुड़ा है। इस क्षेत्र में हजारों मकान, धार्मिक स्थल और अन्य निर्माण मौजूद हैं। स्थानीय लोगों के मुताबिक यहां लंबे समय से बड़ी संख्या में परिवार रह रहे हैं, जबकि रेलवे इस जमीन पर अपना मालिकाना हक होने का दावा करता रहा है।
रेलवे और स्थानीय लोगों के दावे अलग-अलग
रेलवे की ओर से जमीन पर अपने अधिकार के समर्थन में 1959 के नोटिफिकेशन, 1971 के राजस्व रिकॉर्ड और 2017 की सर्वे रिपोर्ट का हवाला दिया गया है। रेलवे का कहना है कि रिकॉर्ड के आधार पर विवादित जमीन उसकी संपत्ति है।
दूसरी तरफ स्थानीय निवासियों का तर्क है कि शुरुआत में विवाद सीमित क्षेत्र को लेकर था, लेकिन बाद में रेलवे ने बड़े भू-भाग पर अपना दावा कर दिया। लोगों का कहना है कि उनके परिवार पीढ़ियों से यहां रह रहे हैं और यह जमीन नजूल भूमि के तौर पर दर्ज रही है।
क्या होती है नजूल जमीन?
नजूल जमीन सामान्य तौर पर ऐसी सरकारी भूमि होती है, जिसका इस्तेमाल सरकार की शर्तों और अनुमति के तहत किया जाता है। ऐसी जमीन पर कब्जे, निर्माण या हस्तांतरण के लिए संबंधित सरकारी नियम लागू होते हैं।
ऐतिहासिक रूप से ऐसी कई जमीनें ब्रिटिश शासन के दौरान जब्त की गई संपत्तियों से जुड़ी रही हैं। आजादी के बाद इनके रिकॉर्ड सरकार के पास रहे। राज्य सरकारें नियमों के तहत ऐसी जमीनों को अलग-अलग उद्देश्यों के लिए लीज पर भी देती रही हैं।
2024 में हिंसा के बाद बिगड़े थे हालात
बनभूलपुरा जमीन विवाद उस समय बेहद संवेदनशील हो गया था, जब 8 फरवरी 2024 को अतिक्रमण हटाने पहुंची प्रशासन और नगर निगम की टीम को हिंसा का सामना करना पड़ा। इस दौरान पथराव, आगजनी और तोड़फोड़ की घटनाएं हुई थीं।
हिंसा में सरकारी और नगर निगम की संपत्ति को नुकसान पहुंचा था। मामले की जांच के बाद मुख्य आरोपी बताए गए अब्दुल मलिक के खिलाफ नुकसान की भरपाई के लिए करीब 2.45 करोड़ रुपये की रिकवरी की कार्रवाई भी की गई थी।
घटना के बाद इलाके में लंबे समय तक तनाव का माहौल रहा और कई परिवारों के पलायन की खबरें भी सामने आई थीं।
पुनर्वास भी रहा है बड़ा मुद्दा
मामले की सुनवाई के दौरान प्रभावित परिवारों के पुनर्वास का मुद्दा भी अहम रहा है। अदालत के निर्देशों के तहत प्रशासन और रेलवे को प्रभावित परिवारों की पहचान करने तथा पात्र लोगों के लिए राहत और पुनर्वास की व्यवस्था पर काम करने को कहा गया था।
प्रभावित पात्र परिवारों के लिए अस्थायी आर्थिक सहायता और स्थायी पुनर्वास की व्यवस्था को लेकर भी निर्देश दिए गए थे। प्रशासन को पुनर्वास से संबंधित प्रक्रिया आगे बढ़ाने के लिए शिविर लगाने जैसी व्यवस्थाएं करने को कहा गया था।
फैसले से पहले बनभूलपुरा में सुरक्षा बढ़ी
सुप्रीम कोर्ट के फैसले को देखते हुए पुलिस-प्रशासन किसी भी स्थिति से निपटने के लिए पूरी तरह सतर्क है। एसपी सिटी और एसपी क्राइम के नेतृत्व में पुलिस टीमों ने संवेदनशील क्षेत्रों में फ्लैग मार्च किया।
इलाके में अतिरिक्त पुलिस बल की तैनाती के साथ ड्रोन और सीसीटीवी कैमरों से निगरानी की जा रही है। प्रशासन की कोशिश है कि फैसले के बाद किसी भी तरह की अफवाह, विरोध या अप्रिय स्थिति को समय रहते नियंत्रित किया जा सके।
अब सबकी नजर सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर है। यह निर्णय न केवल रेलवे की जमीन से जुड़े दावे और आगे की कार्रवाई की दिशा तय करेगा, बल्कि उन परिवारों के भविष्य पर भी असर डाल सकता है जो लंबे समय से इस क्षेत्र में रह रहे हैं।
