अमरोहा, 12 सितंबर।उत्तर प्रदेश के अमरोहा जिले के गजरौला थाना क्षेत्र स्थित रहदरा गांव में दसवीं कक्षा की छात्रा द्वारा कथित छेड़खानी और मानसिक उत्पीड़न से तंग आकर 10 सितंबर (बृहस्पतिवार) को आत्महत्या कर लेने की घटना मात्र एक अपराधिक मामला नहीं है,बल्कि यह सामाजिक और प्रशासनिक ढांचे पर गंभीर सवाल खड़े करती है।
सबसे विडंबनापूर्ण पहलू यह है कि जिस बालिका ने खौफ़ और अपमान के कारण अपनी जीवन लीला समाप्त कर ली, उसका परिवार पीढ़ियों से गांव में पुलिस और कानून-व्यवस्था की प्राथमिक कड़ी यानी ‘चौकीदार’ की भूमिका निभाता आ रहा है।
बताते हैं कि मृतका के दादा और उनके बाद उसके पिता इसी गजरौला थाने के चौकीदार रहे हैं। ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि जब व्यवस्था की अंतिम कड़ी की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं हो पा रही है, तो आम नागरिक का भरोसा किस पर टिकेगा।
पीड़ित पक्ष का कहना है कि आरोपी नय्यूम उर्फ नईम द्वारा छात्रा को कभी विद्यालय के आसपास खड़े मोमोज आदि के ठेले-खोमचे के पास खड़ा होकर विद्यालय की छुट्टी होने का इंतजार करता था, और स्कूल आते-जाते समय फब्तियां कसने से लेकर तरह- तरह की हरकतों से वह लगातार छात्रा को परेशान करता था। रोज-रोज की हरकतों से तंग आकर छात्रा द्वारा परिजनों को जब इस बारे में जानकारी दी गई तो परिजनों ने आरोपी के परिवार से शिकायत की तथा घटना से बाज आने की चेतावनी दी तो पीड़ित पक्ष को कथित तौर पर मारपीट और धमकी का सामना करना पड़ा। अंततः परिस्थितिवश छात्रा ने गले में फंदा लगाकर झूल गई।
घटना की सूचना मिलने के बाद संबंधित थाना पुलिस ने आनन-फानन में मुकदमा दर्ज़ कर मुख्य आरोपी को हिरासत में लिया और 11 सितंबर (शुक्रवार) को उसकी औपचारिक गिरफ्तारी दर्शाते हुए, कोर्ट में पेश करने के बाद जेल भेज दिया। हालांकि मामले का दूसरा आरोपी अभी पुलिस की पकड़ से दूर है। मामला अलग-अलग दो समुदायों से जुडा़ होने के कारण एहतियातन गांव में पुलिस बल तैनात है। पीड़ित पक्ष का कहना है कि मामले में आरोपी की गिरफ्तारी जैसी कानूनी कार्रवाई अलग बात है, लेकिन एक आशावान जीवन समाप्त हो चुका है।
यह घटना प्रशासनिक दावों और जमीनी हकीकत के बीच के अंतर को स्पष्ट करती है।

उत्तर प्रदेश सरकार की ‘मिशन शक्ति’ योजना, ‘एंटी-रोमियो स्क्वॉड’ और हालिया मुख्यमंत्री डैशबोर्ड रैंकिंग (जिसमें अमरोहा को महिला अपराधों में त्वरित कार्रवाई के लिए प्रदेश में दूसरा स्थान मिला था) जैसी उपलब्धियों के बीच यह त्रासदी सवाल खड़ा करती है कि तंत्र समय रहते चेतावनी के संकेतों को क्यों नहीं पहचान सका।
राजनीतिक “मैं भी चौकीदार” और प्रशासनिक स्तर पर “चौकीदार” शब्द को एक कर्तव्यनिष्ठ रक्षक के रूप में पेश किया जाता रहा है। देश के शीर्ष नेतृत्व से लेकर प्रदेश प्रशासन तक ने जनता को यह आश्वासन दिया है कि अपराधियों के लिए कोई जगह नहीं होगी और बहनों-बेटियों की सुरक्षा से समझौता नहीं किया जाएगा।
हालांकि, जब एक समर्पित चौकीदार का परिवार ही लगातार हो रहे उत्पीड़न की गुहार लगाते-लगाते अपनी बेटी को खो देता है, तो यह नारों और योजनाओं की प्रभावकारिता पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता की ओर इशारा करता है।
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़े बताते हैं कि देश में नाबालिगों द्वारा आत्महत्या के मामले चिंताजनक स्तर पर हैं। कागजी रैंकिंग, प्रचार अभियानों और फोटो-सेशनों के इतर आवश्यकता इस बात की है कि बीट पुलिसिंग, गांव-स्तरीय संवाद और शिकायत निवारण की व्यवस्था को वास्तव में संवेदनशील और त्वरित बनाया जाए।
गजरौला की यह दुर्भाग्यपूर्ण घटना एक गंभीर चेतावनी है कि यदि अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति तक सुरक्षा का भरोसा नहीं पहुंचता, तो सुरक्षा तंत्र की वास्तविक सफलता पर सवाल उठते रहेंगे@MP SINGH/INN
