अमरोहा। औद्योगिक क्षेत्र गजरौला में कोविड के बाद प्रदूषण अब सबसे गंभीर स्वास्थ्य संकट के रूप में उभर आया है। रासायनिक कारखानों से निकलने वाले ज़हरीले उत्सर्जन के कारण भूजल और वायु प्रदूषण के खिलाफ किसानों का धरना-प्रदर्शन शनिवार को सातवें दिन में प्रवेश कर गया। भूजल के दूषित होने से क्षेत्र में जनाक्रोश लगातार बढ़ता जा रहा है।
धरना स्थल पर पहुंचे भारतीय किसान यूनियन (संयुक्त मोर्चा) के राष्ट्रीय अध्यक्ष नरेश चौधरी ने कहा कि विकास और प्रदूषण को आमने-सामने खड़ा करना एक बड़ी भूल है। जल, जंगल और ज़मीन का संरक्षण विकास विरोधी नहीं, बल्कि टिकाऊ और दीर्घकालिक विकास की अनिवार्य शर्त है। उन्होंने कहा कि प्रदूषण प्रभावित इलाकों में जहरीली हवा और दूषित पानी के कारण जैव विविधता को भारी नुकसान पहुंचा है, जिससे आसपास के गांवों, नदियों और प्राकृतिक संसाधनों का अस्तित्व खतरे में पड़ गया है।

नरेश चौधरी ने चेतावनी देते हुए कहा कि यदि आज हम अपने कंफर्ट जोन से बाहर निकलकर ठोस कदम नहीं उठाते, तो आने वाली पीढ़ियां हमें माफ नहीं करेंगी। उन्होंने कहा कि “जल, जंगल, ज़मीन बचाओ” कोई भावनात्मक नारा नहीं, बल्कि मानव अस्तित्व का सवाल बन चुका है। यही भविष्य की जीवनरेखा है।
किसान नेता ने आरोप लगाया कि बीते 20 वर्षों में क्षेत्र में रोगियों की बढ़ती संख्या के पीछे रासायनिक कारखानों द्वारा ज़मीन में छोड़े जा रहे ज़हरीले अपशिष्ट की बड़ी भूमिका है। यदि समय रहते प्रभावी कार्रवाई नहीं की गई, तो यह समस्या हर साल और गंभीर होती जाएगी। उन्होंने सरकार से मौजूदा हालात को स्वास्थ्य आपातकाल मानते हुए कोविड एडवाइजरी कमेटी की तर्ज पर एक विशेष समिति गठित करने की मांग की।

इस अवसर पर भाकियू संयुक्त मोर्चा के राष्ट्रीय मुख्य सचिव अरुण सिद्धू सहित चंद्रपाल सिंह, रामकृष्ण चौहान, अंसार मंसूरी, सुशील चौधरी, तेजपाल सिंह, अमरजीत देवल, कैलाश नाथ, जरार चौधरी, लकी चौधरी, शानू चौधरी, अंकुर चौधरी, अब्दुल राशिद, शाकिर अली, हाजी फरीद, मोहम्मद यूसुफ समेत बड़ी संख्या में किसान धरना स्थल पर मौजूद रहे।
