गजरौला–गंगेश्वरी में भूजल बना साइलेंट किलर, 22 दिन से जारी किसानों का बेमियादी धरना
अमरोहा।एक साधारण-सा नल खोलते ही जो पानी निकलता है, वह जीवन देगा या धीरे-धीरे मौत—यह सवाल आज गजरौला और गंगेश्वरी क्षेत्र के दर्जनों गांवों में हर घर की सबसे बड़ी चिंता बन चुका है। यहां पानी प्यास नहीं बुझा रहा, बल्कि बीमारी और मौत का निमंत्रण बन चुका है।
भूजल में घुल चुका यह अदृश्य ज़हर अब डायरिया, हैजा, टाइफाइड, पीलिया, किडनी फेलियर और कैंसर जैसी भयावह बीमारियों का रूप ले चुका है। मौतें होती हैं, मगर कारण दर्ज होता है—बीमारी से मृत्यु। असल में ये मौतें बीमारी से नहीं, बल्कि सरकारी लापरवाही, प्रशासनिक चुप्पी और औद्योगिक प्रदूषण की मिलीभगत से हो रही हैं।
जिस इंदौर को देश का सबसे स्वच्छ शहर कहा जाता है, वहां भी दूषित पानी जानें ले चुका है। ऐसे में गजरौला जैसे रासायनिक उद्योगों से घिरे क्षेत्र और नाईपुरा, तरौली, पतेई खादर, बसैली, शहबाजपुर डोर, रसूलपुर, फाजलपुर गोसाईं, तिगरिया भूड़ जैसे गांवों की हालत का अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं।

कारखानों का ज़हर खेतों से घरों तक
गजरौला के रासायनिक कारखानों से निकलने वाला प्रदूषित पानी खेतों में फैल रहा है, ट्यूबवेलों में उतर चुका है और अब सीधे रसोई तक पहुंच चुका है। यह पानी फसलों को जहरीला बना रहा है, मिट्टी को बंजर कर रहा है और इंसानी शरीर को अंदर से खोखला कर रहा है।यह सिर्फ प्रदूषण नहीं—यह धीरे-धीरे की जा रही हत्या है।
पानी के लिए नहीं, ज़िंदगी के लिए धरना
इसी अन्याय के खिलाफ शहबाजपुर डोर गांव में भारतीय किसान यूनियन (भाकियू) संयुक्त मोर्चा का बेमियादी धरना 22वें दिन भी जारी है। यह धरना किसी सुविधा के लिए नहीं, बल्कि जीवन के मूल अधिकार के लिए है।
संविधान का अनुच्छेद 21 जीवन का अधिकार देता है और सर्वोच्च न्यायालय साफ कह चुका है कि स्वच्छ हवा और स्वच्छ पानी इस अधिकार का अभिन्न हिस्सा हैं। बावजूद इसके, यहां के लोग आज भी ज़हर पीने को मजबूर हैं।

योजनाएं कागजों में, ज़हर नलों में
जल जीवन मिशन, अमृत योजना, स्मार्ट सिटी और स्मार्ट विलेज जैसी योजनाएं घोषणाओं और फाइलों में जिंदा हैं, लेकिन गांवों के नलों में आज भी ज़हर बह रहा है। स्वच्छ पेयजल आज भी अधिकार नहीं, बल्कि प्रशासन की मेहरबानी बनकर रह गया है।
सैकड़ों किसान सड़क पर, सरकार मौन
धरने को राष्ट्रीय अध्यक्ष नरेश चौधरी, मुख्य सचिव अरुण सिद्धू, एससी-एसटी मोर्चा के प्रदेशाध्यक्ष रिंकू सागर, ओम प्रकाश दरोगा, तेजपाल सिंह, इमरान मंसूरी, सानू चौधरी, अहसान अली, सुरजीत सिंह, सुरेंद्र सिंह, रामप्रसाद, वसीयत चौधरी, राशिद चौधरी, ओमपाल सिंह, सोमपाल सिंह, ओम प्रकाश सिंह, मलखान सिंह, अफ्तार अली, अनीस चौधरी, चौधरी चरण सिंह सहित सैकड़ों ग्रामीण और किसान संगठनों ने संबोधित किया।

कब थमेगा यह साइलेंट कत्लेआम?
यह लड़ाई सिर्फ गजरौला की नहीं, बल्कि पूरे देश के उन लाखों लोगों की है जो हर दिन ज़हर पीकर जी रहे हैं। सवाल यह है कि कब तक सरकारें इस अदृश्य हत्यारे को नजरअंदाज करती रहेंगी?
कब तक जीवन का अधिकार सिर्फ संविधान की किताबों में रहेगा?
अब वक्त आ गया है कि स्वच्छ पेयजल को कानूनी रूप से बाध्यकारी अधिकार बनाया जाए, ताकि सुरक्षित पानी हर नागरिक तक पहुंचे—मेहरबानी से नहीं, मजबूरी से।
क्योंकि पानी जीवन है, और जीवन को ज़हर में बदलने का हक किसी को नहीं।
