गजरौला। जिला पंचायत सदस्य धर्मपाल सिंह खड़गवंशी ने कहा कि जब सारी दुनिया नए साल का जश्न मना रही थी तो भारतीय किसान यूनियन भाकियू संयुक्त मोर्चा कैमिकल युक्त मिलावटी जल के मुद्दे पर शहबाजपुर डोर में किसानों की आवाज़ बुलंद करने के लिए धरने पर बैठा हुआ था। और आज़ लोहड़ी पर्व पर भी खुले आसमान में डटा हुआ है।
उन्होंने कहा कि यह मौसम के खिलाफ़ आंदोलन नहीं है, बल्कि उस फ़सल और नस्ल नष्ट करने पर आमादा वालों के खिलाफ़ उस असंतोष की अभिव्यक्ति है,जो लंबे समय से किसानों के भीतर दबा हुआ था। भाकियू संयुक्त मोर्चा ने इस दबे हुए असंतोष को सार्वजनिक मंच पर ला दिया। यह कोई सार्वजनिक जमावड़ा नहीं है, बल्कि गांव, ग़रीब और किसान के प्रति उपेक्षा,अस्तित्व और अहमियत को लेकर पैदा हुई बैचेनी का खुला संकेत है।

उन्होंने चेतावनी दी कि ऐसी स्थिति में आप और हम सभी इससे अछूते नहीं हैं। लोहड़ी को सर्दियों की विदाई और बसंत के आगमन का प्रतीक माना गया है। लोहड़ी की सबसे प्रमुख परंपरा अलाव जलाने की है। मान्यता है कि यह अग्नि ठंड को दूर करने के साथ साथ दूषित मानसिकता और नकारात्मक ताकतों का भी नाश करती है। किसानों के लिए लोहड़ी का विशेष महत्व है क्योंकि यह रबी की बुआई और कटाई से जुड़ा है। ऐसी स्थिति में मंगलवार को आंदोलनकारी किसानों द्वारा लोहड़ी मनाई गई। उन्होंने कहा कि बर्फीली हवाओं से ठिठुरते किसान, ऐसे में प्रदूषण की चुभन में, जहाँ साँसें भी जम जाती हैं, वहाँ 23 दिनों से शहबाजपुर डोर के किसान धरने पर डटे बैठे हुए है।
ज्ञात हो कि अमरोहा जिले के ग्रामीण इलाकों में एक तरफ़ कैमिकल मिले बदबूदार ज़हरीले दूषित पानी के खिलाफ लंबे समय से संघर्ष चल रहा है, तो दूसरी ओर जिंदगी की लय और रीति रिवाजों को थामे रखने की जद्दोजहद भी कम नहीं है।
क्षेत्रीय किसान जत्थेबंदियों की आवाज को बुलंद करने के लिए शहबाजपुर डोर में भारतीय किसान यूनियन (भाकियू) संयुक्त मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नरेश चौधरी के नेतृत्व में पिछले 23 दिनों से बेमियादी धरना जारी है। कैमिकल युक्त दूषित पानी खेतों के ट्यूबवैल और घरों के नलों तक गहरी पैठ जमा चुका है, जिससे फसलें बर्बाद हो रही है, नपुंसकता से नस्लें प्रभावित हो रही हैं और ग्रामीण गंभीर बीमारियों की चपेट में आ रहे हैं। इंदौर की दूषित पानी त्रासदी के बाद यह मामला उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ और केंद्र सरकार दिल्ली में एक नई चेतावनी की तरह उभरा है, लेकिन राज्य सरकार का हिस्सा प्रभारी मंत्री केपी मलिक की प्रेस कॉन्फ्रेंस में गंभीर सवाल बन कर उभरे उक्त संवेदनशील मुद्दे पर हाव-भाव और भाव-भंगिमा ख़ास इशारा कर गई, जब पत्रकारों द्वारा प्रदूषण से क्षेत्र में नपुंसकता (फर्टिलिटी) यानी प्रजनन क्षमता घटने पर प्रेस कॉन्फ्रेंस में शामिल जनप्रतिनिधियों द्वारा ठहाके लगाते हुए मुद्दे को हल्का करने की कोशिश की गई।
वक्ताओं ने कहा कि दूषित पानी से प्रभावित ग्रामीणों के आँसू ठंड से नहीं, बल्कि उस जहरीले पानी से बह रहे हैं जो उनकी फसलों को जहर दे रहा है, उनकी नस्लों को मार रहा है, और उनके बच्चों के भविष्य को छीन रहा है।
फिर भी, कुछ दूर नाईपुरा गांव जहां हालात और दयनीय हैं, जहाँ बीमारियाँ घर-घर में मेहमान बन चुकी हैं, फिर भी महिलाओं और पुरुषों ने हिम्मत नहीं हारी है, उनके लिए लोहड़ी का उत्सव सिर्फ फ़सल की शुरुआत का जश्न नहीं था, बल्कि विपरीत परिस्थितियों में भी जीवन और उत्साह को बनाए रखने का एक सशक्त संदेश था।यह नजारा बेहद मार्मिक और प्रेरणादायक है, जहां एक ओर धरने पर बैठे किसान ठंड में ठिठुरते हुए अपनी मांगों और सांसों के लिए लड़ रहे हैं, वहीं दूसरी ओर जलजनित बीमारियां झेलते हुए भी गांव के लोग लोहड़ी की आग के इर्द-गिर्द इकठ्ठा होकर उम्मीद की लो जलाए हुए हैं।

मंगलवार को महिलाएँ और पुरुष ठंड से काँपते हाथों से आग जलाते हुए, आँखों में आँसू और होंठों पर मुस्कान लिए, वे गीत गा रहे हैं।
“सुंदर मुंडड़े ते बातें कर दे… की धुन में उनकी आवाज़ काँप रही है, लेकिन हार नहीं रही। ऐसे में लौहड़ी सिर्फ उत्सव नहीं है बल्कि जिंदगी की यह आखिरी जिद है।
यह नाईपुरा गांव की उस माँ की जिद है जो अपने बीमार बच्चे को गोद में लिए आग के पास बैठी है, और फिर भी रेवड़ी बाँट रही है।
यह उस बूढ़े किसान की जिद है जो धरने से उठकर लोहड़ी की आग में हाथ सेंकने आया, क्योंकि वह जानता है, कि यदि आज जीवन का यह छोटा-सा रंग भी छूट गया, तो कल सिर्फ अंधेरा बचेगा।देखिए ये दृश्य, ये आँखें, ये आग…और फिर ये… जो उनके खेतों की सच्चाई बयान कर रहे हैं ,जहरीला पानी, मरती फसलें, टूटते सपने।
हर आग के साथ एक सवाल धधक रहा है कि इस हालत में कितनी लोहड़ियाँ और जलेंगी ऐसी ठंड में?
कितने बच्चे और बीमार पड़ेंगे?कितनी माँएँ और रोएँगी?फिर भी आज ये लोग हार नहीं माने।
वे आग जलाकर कह रहे हैं कि हमारी फसलें मर सकती हैं, हमारा पानी जहर हो सकता है,पर हमारी उम्मीद, हमारी संस्कृति, हमारा जीवन अभी नहीं मरेगा।
यह अमरोहा की लोहड़ी नहीं…यह भारत के अन्नदाता के दिल की चीख है, जो आग बनकर जल रही है।
और सवाल अब सिर्फ इतना है क्या कोई सुन रहा है?
क्या कोई इस आग को बुझने से पहले बचा लेगा?

इस ख़ास मौके पर मुख्य रूप से गांव की सबसे बड़ी संसद मानी जाने वाली जिला पंचायत के वरिष्ठ सदस्य धर्मपाल सिंह,सरदार मनदीप रंधावा, सरदार गुरविंदर सिंह, कृष्णा जी, नूर जहा, कलसूम, सकीना,, चंद्रपाल सिंह, रिंकू सागर, अमरजीत देओल,योगेश चौधरी, चरण सिंह,एहसान अली, शाने आलम, नूर चौधरी, शराफत अली, तालिब चौधरी, इरशाद चौधरी आसिफ चौधरी, मंसूर अली, असद अली, रामप्रसाद, आहद अली, आदि मौजूद रहे।
