अमरोहा। दिल्ली–लखनऊ नेशनल हाईवे-09 के किनारे बसे दर्जनों गांवों में ज़िंदगी अब पानी से नहीं, संघर्ष से चल रही है। रासायनिक कारखानों से निकलने वाले जहरीले अपशिष्टों ने बगद नदी को पूरी तरह विषैला बना दिया है। कभी जलीय जीवों और मछलियों से गुलजार रहने वाली यह नदी आज मछलियों की कब्रगाह बन चुकी है।
हालात इतने भयावह हो चुके हैं कि नाईपुरा, शहबाजपुर डोर, तरौली, बसैली, पतेई खादर, फाजलपुर और तिगरिया भूड़ सहित आसपास के गांवों में हैंडपंपों से काला-भूरा, बदबूदार पानी निकल रहा है, जो पीने तो दूर, छूने लायक भी नहीं बचा।

दूषित पानी के चलते ग्रामीण लगातार जलजनित बीमारियों की चपेट में हैं। इम्यूनिटी कमजोर हो रही है, प्रजनन क्षमता प्रभावित हो रही है और आने वाली पीढ़ियों का भविष्य खतरे में पड़ चुका है। यह कोई आशंका नहीं, बल्कि 2026 की कड़वी हकीकत है।
इन्हीं हालातों के खिलाफ भारतीय किसान यूनियन (भाकियू) संयुक्त मोर्चा के बैनर तले शहबाजपुर डोर में किसानों का अनिश्चितकालीन धरना 25वें दिन भी जारी रहा। बुधवार को भारतीय किसान यूनियन (खालसा) के राष्ट्रीय अध्यक्ष सरदार राजेन्द्र सिंह ने धरनास्थल पर पहुंचकर आंदोलन को खुला समर्थन दिया।

उन्होंने दो टूक कहा,
“जल-जंगल-ज़मीन पर रासायनिक कारखानों का कोई एकाधिकार नहीं है। किसानों की जमीन और प्रकृति पर कुठाराघात किसी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। यह लड़ाई प्रदूषण के खिलाफ है, और हम इसे लड़ेंगे भी और जीतेंगे भी।”

सरदार राजेन्द्र सिंह ने चेतावनी दी कि यदि आवश्यकता पड़ी तो गांव-गांव जाकर ग्रामीण युवाओं और छात्रों को भी इस आंदोलन से जोड़ा जाएगा। उन्होंने कहा कि कृषि सभ्यता हमारी रग-रग में बसती है, इसे नष्ट करने की इजाजत किसी को नहीं दी जा सकती।
मकर संक्रांति के अवसर पर किसानों ने धरनास्थल पर खिचड़ी प्रसाद बांटकर पर्व मनाया, लेकिन उत्सव के बीच चेहरों पर गुस्सा और आंखों में चिंता साफ दिखाई दी।

इस मौके पर भाकियू संयुक्त मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नरेश चौधरी ने कहा कि कुछ मुनाफाखोरों की लालच ने प्रकृति प्रदत्त मिट्टी और पानी को ज़हर में बदल दिया है। उन्होंने आरोप लगाया कि केंद्र और राज्य सरकारें इको-फ्रेंडली उद्योगों को बढ़ावा देने के प्रति गंभीर नहीं हैं।
नरेश चौधरी ने मांग की कि रासायनिक कारखानों से निकलने वाले जहरीले धुएं और अपशिष्ट पर तत्काल रोक लगाई जाए और इसके स्थान पर कृषि आधारित, रोजगारपरक और पर्यावरण-अनुकूल उद्योगों का समावेशी विकास मॉडल अपनाया जाए।
उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा,
“यह आंदोलन अब सिर्फ किसानों की लड़ाई नहीं रहा, यह जीवन और मृत्यु की लड़ाई बन चुका है। इंदौर की तरह अगर यहां भी दूषित पानी से मौतें हुईं, तो गजरौला एक नई त्रासदी के रूप में इतिहास में दर्ज होगा।”

उन्होंने सरकार से सवाल किया कि यह ज़हर सिर्फ पानी में है या नीतियों और प्राथमिकताओं में भी घुल चुका है?
“समय रहते सरकार को जवाब देना होगा, वरना किसान और ग्रामीण मिलकर जवाब देंगे।”
धरने में वयोवृद्ध किसान नेता चौधरी चरणसिंह, भाकियू (खालसा) के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजेन्द्र सिंह धारीवाल, भाकियू (संयुक्त मोर्चा) के राष्ट्रीय मुख्य सचिव अरुण सिद्धू, प्रदेशाध्यक्ष रामकृष्ण चौहान, तेजपाल सिंह, एससी-एसटी मोर्चा प्रदेशाध्यक्ष रिंकू सागर सहित बड़ी संख्या में किसान और सामाजिक कार्यकर्ता मौजूद रहे।
