गाजियाबाद के हरीश राणा का मामला भारत में ‘इच्छा मृत्यु’ (Passive Euthanasia) के कानून की सबसे बड़ी अग्निपरीक्षा बन गया है। आज, 15 जनवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट इस पर अपना अंतिम और ऐतिहासिक फैसला सुना सकता है।
1. वह हादसा जिसने सब कुछ बदल दिया
हरीश राणा 2013 में चंडीगढ़ में अपनी पढ़ाई के दौरान एक पीजी (PG) की चौथी मंजिल से गिर गए थे। इस दुर्घटना में उनके सिर पर गंभीर चोटें आईं। तब से पिछले 12 वर्षों से हरीश ‘परमानेंट वेजिटेटिव स्टेट’ (PVS) में हैं। वह न बोल सकते हैं, न सुन सकते हैं और न ही कोई प्रतिक्रिया दे सकते हैं। उनकी पूरी देखभाल उनके बुजुर्ग माता-पिता कर रहे हैं।
2. कानूनी संघर्ष की शुरुआत
हरीश के माता-पिता ने पहले दिल्ली हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। उन्होंने गुहार लगाई थी कि उनके बेटे की भोजन नली (Feeding Tube) हटा दी जाए ताकि वह शांति से मर सके। लेकिन हाई कोर्ट ने इसे ‘एक्टिव यूथेनेशिया’ (जहर देना या हत्या के समान) माना और याचिका खारिज कर दी, क्योंकि हरीश वेंटिलेटर पर नहीं थे। इसके बाद परिवार सुप्रीम कोर्ट पहुँचा।
3. सुप्रीम कोर्ट का रुख (जनवरी 2026)
सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की पीठ ने इस मामले को पूरी तरह से मानवीय आधार पर देखा।
- मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट: एम्स (AIIMS) के डॉक्टरों की एक टीम ने हरीश की जांच की और कोर्ट को बताया कि उनके ठीक होने की कोई भी संभावना शून्य है। कोर्ट ने इस रिपोर्ट को बहुत ही दुखद माना।
- जजों की परिवार से मुलाकात: 13 जनवरी 2026 को जजों ने हरीश के माता-पिता को अपने चेंबर में बुलाया। माता-पिता ने रोते हुए कहा, “हम बूढ़े हो रहे हैं, हमारे बाद इसे कौन देखेगा? हम इसे और तड़पते नहीं देख सकते।”
4. आज के फैसले में क्या हो सकता है?
सुप्रीम कोर्ट ने संकेत दिया है कि हरीश को ‘पैलिएटिव केयर’ (Palliative Care) में भेजा जा सकता है। इसका मतलब है:
- उसे भोजन और पानी देना धीरे-धीरे बंद किया जा सकता है।
- उसे भारी मात्रा में दर्द निवारक दवाएं (Sedatives) दी जाएंगी ताकि उसे जरा भी तकलीफ न हो।
- यह प्रक्रिया डॉक्टरों की एक विशेष टीम की देखरेख में होगी।
5. यह फैसला क्यों महत्वपूर्ण है?
2018 में सुप्रीम कोर्ट ने ‘पैसिव यूथेनेशिया’ को कानूनी मान्यता दी थी, लेकिन उसकी शर्तें बहुत सख्त थीं। Live Law की रिपोर्ट के अनुसार, यदि आज हरीश के पक्ष में फैसला आता है, तो यह भारत का पहला मामला होगा जहाँ कोर्ट किसी ऐसे व्यक्ति को गरिमापूर्ण मृत्यु की अनुमति देगा जो लाइफ सपोर्ट सिस्टम (वेंटिलेटर) पर नहीं है, बल्कि केवल भोजन नली के सहारे जीवित है।
ताजा स्थिति: पूरी दुनिया की नजरें आज सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर हैं, जो ‘गरिमापूर्ण मृत्यु’ के अधिकार (Article 21) की नई परिभाषा तय करेगा।
