गजरौला। दिल्ली–लखनऊ नेशनल हाईवे-09 स्थित गजरौला के शहबाजपुर डोर गांव में रासायनिक कारखानों से फैल रहे ज़हरीले प्रदूषण और भीषण जल संकट के खिलाफ किसानों का अनिश्चितकालीन धरना गुरुवार को 26वें दिन भी पूरी मजबूती से जारी रहा। धरना स्थल पर गुरुवाणी का विशेष पाठ कर किसानों की पीड़ा कम करने की अरदास की गई, वहीं किसान जत्थेबंदियों के लिए अन्नदाता लंगर में खिचड़ी प्रसाद वितरित किया गया।

धरने को भारतीय किसान यूनियन (खालसा) के राष्ट्रीय अध्यक्ष सरदार रजेन्द्र सिंह और भारतीय किसान यूनियन संयुक्त मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नरेश चौधरी ने संयुक्त रूप से संबोधित किया। किसान नेताओं ने दो टूक शब्दों में चेतावनी दी कि यदि गजरौला को जल तबाही से बचाना है, तो रासायनिक कारखानों को अपने खतरनाक उत्सर्जन में कम से कम 97 प्रतिशत कटौती करनी ही होगी।

किसान नेताओं ने कहा कि गजरौला का तथाकथित औद्योगिक विकास पूरे क्षेत्र के भविष्य को निगल रहा है। दूषित जल, जहरीली मिट्टी और दमघोंटू हवा ने खेती, पशुपालन और मानव जीवन—तीनों को संकट में डाल दिया है। इस त्रासदी के लिए कारखानेदारों की जिम्मेदारी असमान रूप से कहीं अधिक है।
उन्होंने कहा कि दुनिया के सबसे अमीर लोग—सुपर रिच—एक दिन में उतना प्रदूषण कर रहे हैं, जितना पूरा इलाका सालभर में नहीं करता। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, एक औसत अरबपति अपने निवेशों से हर साल करीब 19 लाख टन रासायनिक उत्सर्जन करता है, जो एक आम नागरिक के उत्सर्जन से लगभग 3.46 लाख गुना अधिक है।

इस ज़हरीले उत्सर्जन का दुष्प्रभाव केवल इंसानों तक सीमित नहीं है। लाखों जीव-जंतु, पक्षी, मवेशी और फसलें बर्बाद हो रही हैं, वहीं क्षेत्र में बीमारियों और असमय मौतों का ग्राफ लगातार बढ़ रहा है। विडंबना यह है कि जल संकट के लिए सबसे कम जिम्मेदार कमजोर ग्रामीण समुदाय, खासकर महिलाएं और बच्चियां, इसकी सबसे भारी कीमत चुका रही हैं।जानकारों के अनुसार, शोध स्पष्ट बताते हैं कि सरकार के पास जल त्रासदी से निपटने का सबसे कारगर रास्ता सबसे बड़े प्रदूषकों पर सीधा प्रहार करना है। ये कंपनियां न केवल पर्यावरण को नुकसान पहुंचा रही हैं, बल्कि नीति निर्माण पर भी असमान दबाव डालती हैं और जन विरोध को कमजोर करने के हथकंडे अपनाती हैं।

भाकियू संयुक्त मोर्चा और अन्य किसान जत्थेबंदियों ने सरकार से मांग की कि सुपर रिच के जहरीले रासायनिक उत्सर्जन पर सख्त लगाम लगाई जाए। अमीर प्रदूषकों से कीमत वसूलकर प्रभावित ग्रामीणों को मुआवजा दिया जाए और खतरनाक रासायनिक उद्योगों पर नियंत्रण के लिए ‘रिच पॉल्यूटर प्रॉफिट टैक्स’ लागू किया जाए, ताकि भूमिगत जल प्रदूषण से हुए नुकसान की आंशिक भरपाई हो सके।

मंडलाध्यक्ष एहसान अली ने चेतावनी देते हुए कहा कि गजरौला का जल संकट कोई प्राकृतिक आपदा नहीं, बल्कि कुछ बेहद समृद्ध लोगों की बेलगाम कंपनियों, अंधे निवेश और नीतिगत दबदबे का नतीजा है। जब तक सरकार मुनाफे से ऊपर लोगों, जल-जंगल-जमीन और जनस्वास्थ्य को प्राथमिकता नहीं देगी, तब तक हवा-पानी जैसे मूलभूत अधिकार सिर्फ नारे बनकर रह जाएंगे। इसकी कीमत खादर, तरौली और गजरौला जैसे इलाकों के सबसे कमजोर लोग चुकाते रहेंगे।उन्होंने कहा कि यदि सरकार इस गंभीर जल त्रासदी पर सचमुच संवेदनशील है, तो खतरनाक उत्सर्जन पर सख्ती कर इलाके को उसकी स्वच्छ हवा, साफ पानी और उपजाऊ मिट्टी लौटाई जा सकती है।

धरना स्थल पर वयोवृद्ध किसान नेता चौधरी चरण सिंह, राष्ट्रीय सचिव चंद्रपाल सिंह, अमरजीत देओल, राजवीर सिंह, यशवीर सिंह, गंगाराम, मंसूर अली, मोहम्मद अली, डॉ. शिवकुमार, देवेंद्र सिंह, राम प्रसाद, ओम प्रकाश, सलीम अहमद, शान चौधरी, स्वामीनाथ सहित सैकड़ों किसान मौजूद रहे।
धरने को रोज़ाना बढ़ते समर्थन से किसान आंदोलन और मजबूत होता जा रहा है, जिससे प्रशासन पर रिपोर्ट सार्वजनिक करने और सख्त कार्रवाई करने का दबाव लगातार बढ़ रहा है।
