गजरौला (अमरोहा)। एक ओर देश भर में गणतंत्र दिवस की तैयारियाँ चरम पर हैं—परेड ग्राउंड चमक रहे हैं, सड़कें धुल रही हैं, फूलों की मालाएँ लटक रही हैं और मंचों से विकसित भारत की गूंज सुनाई दे रही है। वहीं दूसरी ओर, उसी विकसित भारत के एक कोने में गजरौला के किसान ठंड में खुले आसमान तले 29वें दिन भी जल संकट के खिलाफ संघर्षरत हैं।

दिल्ली–लखनऊ नेशनल हाईवे-09 स्थित शहबाजपुर डोर पर बैठे किसानों का आरोप है कि उनके नलों से अब पानी नहीं, रासायनिक प्रदूषण मिला “केमिकल का शोरबा” निकलता है। खेतों में फसल की जगह ज़हर की खेती हो रही है। कभी सदानीरा रही बगद नदी में मछलियाँ तैरती नहीं, उल्टे तैरकर मर जाती हैं। किसानों का कहना है कि गर्भस्थ शिशु तक जहरीली सांसों के बीच पलने को मजबूर हैं, जिससे आने वाली पीढ़ियों के स्वास्थ्य पर गंभीर संकट मंडरा रहा है।
किसान जत्थेबंदियों ने सवाल उठाया कि राष्ट्रीय पर्व आते ही शासन-प्रशासन रात-दिन एक कर देता है, लेकिन जब दूषित पानी की जांच रिपोर्ट जारी करने की बात आती है तो “नमूने ऊपर गए हैं”, “मीटिंग चल रही है” जैसे जवाबों के पीछे वर्षों से फाइलें अटकी रहती हैं।

किसानों का आरोप है कि जनप्रतिनिधि मंच से “जय जवान, जय किसान” के नारे लगाते हैं, लेकिन मंच से उतरते ही गजरौला के मामले को टालने की सलाह दे दी जाती है।
किसानों ने तीखा तंज कसते हुए कहा कि इस बार नेतागण गणतंत्र दिवस पर नया संकल्प लें—26 जनवरी को तिरंगा फहराएँ और 27 जनवरी से यह न भूलें कि गजरौला के किसान अब भी ज़हर पीने को मजबूर हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि उन्हें राष्ट्रीय पर्व पर गर्व है, बस उसमें नाईपुरा के किसानों के लिए साफ पानी का अधिकार भी जोड़ दिया जाए।

धरना स्थल पर वयोवृद्ध किसान नेता चौधरी चरण सिंह, भारतीय किसान यूनियन (संयुक्त मोर्चा) के राष्ट्रीय नरेश चौधरी सहित बड़ी संख्या में किसान मौजूद रहे। नाईपुरा निवासी किसानों के साथ-साथ अमरजीत देओल, अहसान अली, शान्य आलम, शान चौधरी, गनपत सिंह, गंगा राम, ओम प्रकाश, रामप्रसाद, असद अली, अदनान अली, मंसूर अली, गेंदा सिंह, हैदर चौधरी, बाबू चौधरी, नौशाद चौधरी, विजय सिंह समेत अनेक किसान इस संघर्ष में शामिल रहे।

किसानों ने अंत में कहा—“जय हो उस गणतंत्र की, जो परेड तो दिखा देता है, पर ज़हर को रोक नहीं पाता; जय हो उन रिपोर्टों की, जो कभी नहीं आतीं।”
