अमरोहा। औद्योगिक जहरीले कचरे से त्रस्त गजरौला क्षेत्र में प्रशासन की जांच एक बार फिर सवालों के घेरे में आ गई है। वर्षों से गंभीर बीमारियों से जूझ रहे किसानों के बीच जांच समिति की रिपोर्ट ने आक्रोश और बढ़ा दिया है। 32 दिनों से लगातार धरना दे रहे किसानों का आरोप है कि प्रशासन जांच के नाम पर केवल खानापूर्ति कर रहा है और असल मुद्दे से ध्यान भटकाने की कोशिश की जा रही है।
किसानों का साफ सवाल है—अगर फैक्ट्री की हर व्यवस्था जांच में “सही” है, तो फिर गजरौला और आसपास के इलाकों में दूषित पानी से दर्जनों बीमारियां क्यों फैल रही हैं? किसानों का कहना है कि कागजों में सब कुछ दुरुस्त दिखाना आसान है, लेकिन जमीनी हकीकत कोई भी आकर देख सकता है।

जिला मजिस्ट्रेट श्रीमती निधि गुप्ता वत्स के निर्देश पर बुधवार को उपजिलाधिकारी श्रीमती चंद्रकांता की अध्यक्षता में गठित समिति ने गजरौला स्थित मैसर्स तेवा एपीआई का स्थलीय निरीक्षण किया। जांच रिपोर्ट में इकाई को संचालित अवस्था में पाया गया, मिट्टी और पानी के सैंपल लिए गए, ईटीपी प्लांट को सही बताया गया और यह भी कहा गया कि औद्योगिक अपशिष्ट जल खुले में नहीं बहाया जा रहा है।

जांच आख्या में जल-वायु प्रदूषण नियंत्रण मानकों के पालन, कृषि भूमि की सुरक्षा और बॉयलर निरीक्षण जैसी औपचारिक बातों का उल्लेख किया गया है। समिति के अनुसार, फैक्ट्री परिसर के भीतर और बाहर से मिट्टी व जल के नमूने लिए गए हैं और नगर पालिका के सीवरेज का पानी भी इकाई में पाया गया।

लेकिन किसानों का आरोप है कि हर जांच के बाद वही रटी-रटाई रिपोर्ट आती है, जबकि बीमारियां बढ़ती जा रही हैं। उनका कहना है कि जब तक जांच निष्पक्ष और स्वतंत्र एजेंसियों से नहीं होगी और दोषियों पर ठोस कार्रवाई नहीं की जाएगी, तब तक धरना जारी रहेगा।

धरनारत किसानों ने चेतावनी दी है कि यदि प्रशासन ने गंभीरता नहीं दिखाई तो आंदोलन और तेज किया जाएगा। किसानों का सीधा आरोप है कि जांच समिति की रिपोर्ट और जमीनी सच्चाई के बीच गहरी खाई है, और यही खाई गजरौला के लोगों की सेहत पर भारी पड़ रही है।
