अमरोहा। जनपद के गजरौला क्षेत्र में दूषित पानी, जहरीले पर्यावरण और सरकारी उदासीनता के खिलाफ किसानों का आक्रोश लगातार उफान पर है। भारतीय किसान यूनियन (भाकियू) संयुक्त मोर्चा के तत्वावधान में शहबाजपुर डोर में चल रहा बेमियादी धरना एक माह से अधिक समय पूरा कर चुका है, लेकिन अब तक न तो दूषित जल की समस्या का समाधान हुआ है और न ही जिम्मेदारों पर कोई ठोस कार्रवाई की गई है।
बुधवार को धरना स्थल पर किसानों को संबोधित करते हुए भाकियू संयुक्त मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नरेश चौधरी ने गजरौला की भयावह तस्वीर पेश करते हुए कहा कि यहां सड़क के किनारे ‘दो भारत’ साफ नजर आते हैं। एक तरफ बिसलेरी का गेस्ट हाउस है, जहां शुद्ध पानी की भरमार है, तो वहीं दूसरी ओर नाईपुरा गांव है, जहां लोग ज़हरीला पानी पीने को मजबूर हैं। उन्होंने इसे सामाजिक और प्रशासनिक विडंबना बताते हुए कहा कि वर्षों से इलाके की हवा, मिट्टी और पानी में ज़हर घुलता रहा, लेकिन जिम्मेदार विभाग आंखें मूंदे बैठे रहे।

नरेश चौधरी ने तीखे सवाल उठाते हुए कहा, “नाम बड़े, जांच धीमी और कार्रवाई नदारद—यही सिस्टम की कड़वी हकीकत है।” उन्होंने कहा कि अगर समय रहते निगरानी और नियंत्रण किया गया होता, तो आज हालात इतने भयावह न होते। बैस्ट क्राप (कैमचूरा) क्षेत्र में गैस रिसाव जैसी घटनाओं का जिक्र करते हुए उन्होंने चेताया कि प्रशासन तब सक्रिय होता है, जब स्थिति विस्फोटक हो जाती है। फिलहाल तंत्र इसी इंतजार में चुप बैठा है, जबकि सच्चाई यह है कि क्षेत्र की प्राकृतिक संपदा तबाह हो चुकी है। जलस्रोत सूख गए हैं, बगद नदी अब ज़हरीले रसायनों को ढोने वाला नाला बन चुकी है और पूरा पारिस्थितिकीय तंत्र बुरी तरह बिगड़ गया है।
उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि पेट्रोल-डीजल से लेकर रोजमर्रा की जरूरत की वस्तुओं पर सबसे ज्यादा टैक्स किसान ही देता है, लेकिन बदले में उसे शुद्ध पानी और सुरक्षित वातावरण नहीं, बल्कि केमिकल्स और बीमारियां मिल रही हैं। उन्होंने सवाल किया कि “हमारे टैक्स से यह कैसा विकास है?” नरेश चौधरी ने चेतावनी दी कि प्रकृति के साथ खिलवाड़ अब बंद करना होगा, क्योंकि मिट्टी और पानी में घुला ज़हर सिर्फ प्रदूषण नहीं, बल्कि लंबे समय से चली आ रही एक मूक त्रासदी बन चुका है, जो अनगिनत परिवारों की सांसों पर सीधा हमला कर रहा है।

किसान नेता अरुण सिद्धू ने कहा कि अन्नदाता अनाज उगाता है, पशुधन पालता है और देश की भूख मिटाता है, लेकिन वही सिस्टम उसके खेत, मिट्टी और पानी को ज़हरीला बना रहा है। उन्होंने बताया कि नाईपुरा गांव, जिसे सूबे की 24 करोड़ आबादी में सबसे गरीब क्षेत्रों में गिना जाता है, वहां प्रति व्यक्ति मासिक आय नौ हजार रुपये से भी कम है। ऐसे हालात में जलजनित बीमारियों से जूझ रहे परिवारों के लिए इलाज कराना बेहद मुश्किल हो गया है।
प्रदेश प्रभारी एवं मंडलाध्यक्ष एहसान अली ने कहा कि नाईपुरा के मासूम बच्चे बदबूदार और पीला पानी पीने को मजबूर हैं, जिससे कैंसर, दमा और अन्य गंभीर बीमारियां तेजी से फैल रही हैं। फसलें प्रदूषित हो चुकी हैं और हालात इतने खराब हैं कि गांव में शादियां तक रुक गई हैं, क्योंकि कोई भी अपनी बेटी को ज़हरीली धरती पर भेजने को तैयार नहीं है।

धरना-प्रदर्शन में प्रदेश सचिव ओम प्रकाश, होमपाल सिंह, आजम खान, सोमपाल सिंह, हैदर चौधरी, विजय सिंह, रामप्रसाद सिंह, सतपाल सिंह, दौलत राम प्रधान, प्रकाश सिंह, पप्पू उपाध्याय, ओमपाल सिंह, विवेक गुप्ता, इकरार मालिक, मंसूर अली, एहसान और आसिफ अली समेत बड़ी संख्या में किसान मौजूद रहे।
किसानों ने दो टूक शब्दों में चेतावनी दी कि जब तक नाईपुरा और आसपास के गांवों को शुद्ध पेयजल, प्रदूषण से मुक्ति और दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई नहीं मिलती, तब तक उनका बेमियादी धरना जारी रहेगा और आंदोलन को और तेज किया जाएगा।
