अमरोहा (विशेष संवाददाता)।किसानों में भारत-अमेरिका व्यापार समझौते को लेकर भी गहरा असंतोष व्याप्त है।
उत्तर प्रदेश के अमरोहा जिले के गजरौला औद्योगिक क्षेत्र में स्थित नाईपुरा और शहबाजपुर डोर गांवों के किसान प्रदूषण और दूषित जल के खिलाफ अपनी जिंदगी की लड़ाई लड़ रहे हैं। भारतीय किसान यूनियन (भाकियू )संयुक्त मोर्चा के बैनर तले शहबाजपुर डोर में चल रहा किसानों का बेमियादी धरना आज 48वें दिन में प्रवेश कर चुका है। किसान आरोप लगा रहे हैं कि गजरौला के रासायनिक कारखानों से निकलने वाला जहरीला अपशिष्ट भूजल को दूषित कर रहा है, जिससे फसलें बर्बाद हो रही हैं, पशु बीमार पड़ रहे हैं और ग्रामीणों में कैंसर, श्वसन रोग जैसी जानलेवा बीमारियां बढ़ रही हैं।

किसानों का कहना है कि यह कोई विद्रोह नहीं, बल्कि अपनी धरती, जल-जंगल और भविष्य की रक्षा की साझा पुकार है। वे मांग कर रहे हैं कि कारखानों के प्रदूषण पर सख्त निगरानी हो, सीएसआर फंड का सही उपयोग सुनिश्चित किया जाए और दूषित जल की समस्या का स्थायी समाधान निकाला जाए। उनका तर्क है कि औद्योगिक विकास के नाम पर एकतरफा फैसले थोपे जा रहे हैं, जबकि स्थानीय समुदाय की आवाज अनसुनी हो रही है। इंदौर की भगीरथपुरा घटना को राष्ट्रीय चेतावनी बताते हुए वे आगाह करते हैं कि यदि अब नहीं चेते तो अमरोहा में भी बड़ी त्रासदी हो सकती है।

इस बीच, किसानों में भारत-अमेरिका व्यापार समझौते को लेकर भी गहरा असंतोष है। वे डर जता रहे हैं कि डेयरी क्षेत्र में टैरिफ कम होने से आयात बढ़ेगा, दूध की कीमतें गिरेंगी और छोटे किसानों (1-2 गाय वाले) को 1 लाख करोड़ से अधिक का सालाना नुकसान हो सकता है। हालांकि, केंद्र सरकार ने संसद में स्पष्ट किया है कि कृषि और डेयरी क्षेत्र पूरी तरह संरक्षित हैं, तथा प्रमुख फसलें जैसे चावल, गेहूं, सोयाबीन और डेयरी उत्पाद समझौते से बाहर रखे गए हैं। फिर भी, औपचारिक घोषणा के अभाव में अनिश्चितता बनी हुई है, जो किसानों के विरोध को और भड़का सकती है।

सूबे की सरकार पर व्यंग्य करते हुए किसान कहते हैं कि विकास का ढिंढोरा पीटने के नाम पर करोड़ों खर्च हो रहे हैं, लेकिन वास्तविक समस्याओं जैसे प्रदूषित जल से मौतें और स्वास्थ्य संकट पर ध्यान नहीं दिया जा रहा। टैक्स के बदले नाईपुरा के किसान दूषित जलजनित बीमारियों से जूझ रहे हैं, जिनमें पैनक्रियाज कैंसर जो दुनिया की ख़तरनाक बीमारियों में से एक है,अब व्यथित कर रही है। किसानों का सरकार से सवाल है कि यदि उन्हें जीने की गारंटी नहीं, तो फिर रोजमर्रा की चीजों पर टैक्स किस बात का?
यह धरना न केवल पर्यावरण और स्वास्थ्य की लड़ाई है, बल्कि कारपोरेट हितों बनाम ग्रामीण अस्तित्व की जंग भी है। प्रशासन की चुप्पी और कार्रवाई की कमी किसानों के गुस्से को बढ़ा रही है। समय रहते संवाद और ठोस कदम न उठाए गए तो यह आंदोलन और व्यापक रूप ले सकता है।

इस अवसर पर विशेष रूप से दूरदराज़ इलाके से यहां आए किसानों के साथ धरने पर पहुंचे राष्ट्रीय अध्यक्ष नरेश चौधरी, प्रदेश अध्यक्ष रामकृष्ण चौहान, अल्पसंख्यक मोर्चा प्रभारी एवं मंडलाध्यक्ष अहसान अली, गंगाराम सिंह, होमपाल सिंह, नरेंद्र चौहान, बृजमोहन शर्मा, शुभम शर्मा,अमित सिंह, शीशपाल सिंह, शानू चौधरी, ओम प्रकाश सिंह, आज़म चौधरी, सोमपाल सिंह, चन्द्रपाल, महेंद्र सिंह समेत काफी संख्या में किसान मौजूद रहे।
